महापाप (बड़े गुनाह) क्या हैं ?

महापाप (बड़े गुनाह) क्या हैं

महापाप (बड़े गुनाह) प्रत्येक वह कार्य जिस का पाप बहुत ज़्यादा हो और पाप और गुनाह के कारण उसकी गम्भीरता बढ़ जाती है, इसी प्रकार प्रत्येक कार्य जिस में लिप्त व्यक्ति के लिए सजा या लानत (धिक्कारित) या अल्लाह के क्रोध का वादा किया गया हो, उसे महापाप कहते हैं।

महापाप (बड़े गुनाह) प्रत्येक वह कार्य जिस का पाप बहुत ज़्यादा हो और पाप और गुनाह के कारण उसकी गम्भीरता बढ़ जाती है, इसी प्रकार प्रत्येक कार्य जिस में लिप्त व्यक्ति के लिए सजा या लानत (धिक्कारित) या अल्लाह के क्रोध का वादा किया गया हो, उसे महापाप कहते हैं।

वास्तविक्ता तो यह है कि महापापों की संख्यां के प्रति हदीस शास्त्रों में मतभेद हैं। कुछ लोगों ने महापाप को  हदीस में बयान की गई सात वस्तुओं में सीमित कर दिया है और कुछ लोगों ने 70 बड़े गुनाह को गिनाया है तो कुछ लोगों ने उस से अधिक कहा है।

परन्तु महापापों की सही संख्यां हदीस से प्रमाणित नहीं है बल्कि यह विद्वानों की कोशिश है कि रसूल की  हदीसों से लिया गया है। जिस कार्यकर्ता को जहन्नम की धमकी, या अल्लाह की लानत या अल्लाह का ग़ज़ब और क्रोध उस पर उतरता है तो वह महापापों में शुमार होगा। जैसा कि इस्लामिक विद्वानों ने महापाप की परिभाषा किया है।

महापापों से अल्लाह और उस के रसूल ने दूर रहने का आदेश दिया है और मानव को अपने आप को इन गंदगियों से प्रदुषित न करने पर उभरा है।

महापाप से अल्लाह और उसके रसूल (सल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दूर रहने की आदेश दिया है। जैसा कि अल्लाह का कथन है। “ जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों से बचते हैं और जब उन्हें (किसी पर) क्रोध आता है तो वे क्षमा कर देते हैं।” (सूरः  37

दुसरे स्थान पर अल्लाह तआला का फरमान है। “ यदि तुम उन बड़े गुनाहों से बचते रहो, जिनसे तुम्हें रोका जा रहा है, तो हम तुम्हारी बुराइयों को तुमसे दूर कर देंगे और तुम्हें प्रतिष्ठित स्थान में प्रवेश कराएँगे।” (सूरः निसाः 31

रसूल (सल्लल्लाहु अलिह व सल्लम) ने फरमायाः “ पांच समय की फर्ज़ नमाज़ें और जुमा से दुसरे जुमा तक और रमज़ान से दुसरे रमज़ान तक नेक कार्य गुनाहों के लिए प्रायश्चित हैं जब तक कि महापापों से बचा जाए।” (सिल्सिला सहीहा- अलबानीः 3322

इस हदीस में स्पष्ठ रूप से बड़े गुनाह से सुरक्षित रहने पर उत्साहित किया है और यह सूचना दी गई है कि नेकियां करने से छोटे पाप मिट जाते हैं। ”

महापाप से प्रायश्चित कैसे संभव है

अल्लाह से वास्तविक तौबा और महापाप से बहुत दूरी के माध्यम से महापाप से प्रायश्चित किया जा सकता है। हमेशा उस पाप के होने के कारण अल्लाह रो रो कर माफी मांगनी चाहिये और यदि वह महापाप किसी व्यक्ति के हक और अधिकार से संबन्धित है तो उस अधिकार को अदा करना अनिवार्य होगा।

महापाप अपने अप्राध और अल्लाह की नाराज़गी के कारण कई क़िसमों में विभाजित हैं। सब से बड़ा पाप अल्लाह के साथ शिर्क है। जैसा कि सही हदीस में आया है।

عن أبي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ: اجْتَنِبُوا السَّبْعَ الْمُوبِقاتِ قَالُوا: يا رَسُولَ اللهِ وَما هُنَّ قَالَ: الشِّرْكُ بِاللهِ، وَالسِّحْرُ، وَقَتْلُ النَّفْسِ الَّتي حَرَّمَ اللهُ إِلاَّ بِالْحَقِّ، وَأَكْلُ الرِّبا، وَأَكْلُ مَالِ الْيَتيمِ، وَالتَّوَلِّي يَوْمَ الزَّحْفِ، وَقَذْفُ الْمُحْصَنَاتِ الْمُؤْمِناتِ الْغافِلاتِ). صحيح البخاري: 2766, صحيح مسلم: 89)

अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन हा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः“ सात सर्वनाश करने वाली चीजों से बचो, प्रश्न किया गया है, वह क्या हैं ? तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः अल्लाह के साथ शिर्क, जादू, बेगुनाह की हत्या, अनाथों का माल नाहक खाना, ब्याज खाना, युद्ध की स्थिति में युद्धस्थल से भागना, भोली भाली पवित्र मुमिन महिलाओं पर प्रित आरोप लागना (सही बुखारीः 2766 और सही मुस्लिमः 89)

दुसरी हदीस में रसूल ने लोगों को खबरदार करते हुए कहा, महापापों में सह से बड़ा महापाप किया है जिस पर सहाबा ने कहा कि आप ही सूचित करें जैसा कि हदीस में वर्णन हुआ है।

عن أبي بَكْرَةَ قَالَ: قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم: أَلا أُنَبِّئُكُمْ بِأَكْبَرِ الْكَبائِرِ ثَلاثًا، قَالُوا: بَلى يا رَسُولَ اللهِ، قَالَ: الإِشْراكُ بِاللهِ وَعُقوقُ الْوالِدَيْنِ وَجَلَسَ،وَكانَ مُتَّكِئًا،فَقالَ أَلا وَقَوْلُ الزّورِ قَالَ فَما زَالَ يُكَرِّرُها حَتّى قُلْنا لَيْتَهُ سَكَتَ – (صحيح البخاري : 2654)

अबू बकरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन हा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः“““ “क्या मैं तुम्हें सब से बड़े पापों की जानकारी न दूँ,  तीन बर फरमाया, तो हमने कहा, क्यों नहीं, ऐ अल्लाह के रसूल! आप ने कहा, अल्लाह के साथ शिर्क करना, माता पिता की अवज्ञा करना, रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) टेक लगाए हुए थे, तो सीधा बैठ गए और फरमयाः सुनो, झूटी गवाही देना, (रावी ) कहते हैं, यह शब्द रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बार बार दुहराते रहें, यहां तक कि सबाहा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) हृदय में कल्पना करने लगे कि काश रसूल खामूश हो जाते। (सही बुखारीः 2654

عن عَبْدِ اللهِ بْنِ عَمْرٍو قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم: إِنَّ مِنْ أَكْبَرِ الْكَبائِرِأَنْ يَلْعَنَ الرَّجُلُ والِدَيْهِ قِيلَ يا رَسُولَ اللهِ وَكَيْفَ يَلْعَنُ الرَّجُلُ والِدَيْهِ قَالَ: يَسُبُّ الرَّجُلُ أَبا الرَّجُلِ فَيَسُبُّ أَباهُ وَيَسُبُّ أُمَّهُ  – صحيح أبي داؤد -الألباني- 5141)

अबदुल्लाह बिन अम्र (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः “बेशक सब से बड़े गुनाह में से है कि व्यक्ति अपने माता-पिता को गाली दे, लोगों ने आश्चर्य से पूंछा, क्या कोई अपने माता पिता को गाली देता है ? तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः व्यक्ति दुसरे व्यक्ति के पिता को गाली देता है तो वह उस के पिता को गाली देता है और उस के माता को गाली देता है।” -सही अबू दाऊदः 5141

परन्तु आज के युग में माता पिता को गाली देना और मारना पीटना और उनकी हत्या करना तो सर्वजनिक घटना हो चुकी है। जरा ध्यान पूर्वक विचार करें कि जब दुसरे व्यक्ति के माता पिता को गाली देना महापाप और बड़ा गुनाह है, क्योंकि संभावना है कि वह व्यक्ति उस के माता पिता को गाली दे, तो माता पिता को गाली देना या उन्हे मारना पीटना या उनकी हत्या का पाप कितना महान होगा जिस की कल्पना भी मुश्किल है.? महापापों की कुछ उदाहरण हदीस के माध्यम से पेश की गईं परन्तु वास्तविक्ता तो यह है कि महापापों की संख्यां के बहुत ज़्यादा हैं, जैसा की हदीस शास्त्रों के बातों गुज़र चुकी हैं और इमाम ज़हबी (उन पर अल्लाह की रहमत हो) ने एक पुस्तक (अल-कबाइर) संकलन किया जिस में महापापों को हदीस एवं क़ुरआन से प्रमाणित किया है।

अल्लाह हमें और आप को महापापों से सुरक्षित रखें। आमी।।।।।।।न

जिन चिज़ों के करने से रोज़ा नहीं टूटता है।

रमज़ान महीने की बर्कत और पवित्रता से हम उसी समय लाभ उठा सकते हैं जब हम अपने बहुमूल्य समय का सही प्रयोग करेंगे, इस कृपा, माफी वाले महीने में सही से अल्लाह तआला की पुजा- अराधना करेंगे जिस तरह से प्रिय रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अल्लाह तआला की पुजा- अराधना किया है। वह इबादतें करेंगे जिसके करने से हमें पुण्य प्राप्त हो और हमारी झोली पुण्य से भर जाए और हमारा दामन पापों से पाक साफ हो जाए और उन कामों से दूर रहें जो इस पवित्र महीने की बर्कत तथा अल्लाह की कृपा, माफी से हमें महरूम ( वंचित) कर दे।

रमज़ान के महीने की सब से महत्वपूर्ण इबादत रोज़ा (ब्रत) है जिसे उसकी वास्तविक स्थिति से रखा जाए और उन कर्मों तथा कार्यों से दूर रहा जाए जो रोज़े को भंग ( खराब) कर दे।

रोज़े रखने के लिए सब से पहले रात या सुबह सादिक़ से पहले ही रोज़ा रखने की नीयत किया जाए। इस लिए कि जो व्यक्ति रात में ही रोज़ा की नीयत नही करेगा, उस का रोज़ा पूर्ण न होगा। मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है ” जो व्यक्ति रात ही से रोज़ा की नीयत न करे , उस का रोज़ा नही। ” ( अल- मुहल्लाः इब्नि हज़्म, अल-इस्तिज़्कारः इब्नि अब्दुल्बिर)

रोज़े की हालत में यदि कोई भूल कर खा पी ले तो उस का रोज़ा भंग नहीं होता जैसा कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सही हदीस से प्रमाणित है।

तो उन्हीं चीजें के करने से रोज़ा टूट जाता है जिन चीज़ों के प्रति हदीस या कुरआन से प्रमाणित है और रोज़े की स्थिति में उन से मना किया गया है। इनके अलावा वस्तुओं के करने से रोज़ा नहीं टूटता है। परन्तु कुछ चीज़े के प्रति लोगों में रोज़े के टूटने का आशंका हैं परन्तु उस से रोज़ा टूट नहीं है।

उन्हीं चीज़ों के प्रति निम्न में कुछ बातें पैश की जाती है।

  1.  आंख और नाक में एक दो बूंद दवा (औषधि) डालने से जो गले तक नहीं पहुंचे।

2.  शरीर के सुराखों से जाने वाले पानी और तेल से रोज़ा नहीं टूटता है।

3.  जांच के कारण शरीर से निकाले जाने वाले थोड़ा खून से रोज़ा नहीं टूटता है।

4.  रोग के कारण इंजेक्शन लेने से रोज़ा नहीं टूटता है जैसे कि सूगर की बिमारी के लिए इंसुलीन का इंजेक्शन आदि सिवाए भूक मारने और शक्ति पहुंचाने वाले इंजेक्शन न हों।

5.   सुरमा लगाने से रोज़ा नहीं टूटता है।

6.   खुश्बू लगाने से रोज़ा नहीं टूटता है।

7.   दांतून करने से रोज़ा नहीं टूटता है। बल्कि सुन्नत से प्रमाणित है कि दोपहर से पहले करना अच्छा है यदि कोई दोपहर के बाद भी मिस्वाक करता है तो कोई बात नहीं परन्तु मिस्वाक करते समय मुंह से निकलने वाले धूक को न निगला जाए।

8.   पत्नी को धोड़ा बहुत चुम्मा लेने और शरीर से शरीर मिला कर सोने से रोज़ा नहीं टूटता है। परन्तु चुम्मा लेने और शरीर से शरीर मिला कर सोने से दोनों में संभोग की इच्छा उत्पन्न न हों और रोज़े की सीमा का उलंघन न हों तो पति और पत्नी इस प्रकार रह सकते हैं, यदि पति और पत्नी के इस प्रकार रहने में रोज़े की सीमा का उलंघन का भय हों तो दोनों दूर रहेंगे। जैसा कि आईशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की हदीस से पता चलता है।

9.   रात में पत्नी से संभोग किया और सो गये और आंख फजर के बाद खुली तो वह उठ कर गुस्ल करेगा और रोजा रखेगा जैसा कि आईशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की हदीस से प्रमाणित है कि ” रसूल (सल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपनी पत्नी के साथ रहने के कारण जनाबत से होते और फजर हो जाता और फिर उठ कर गुस्ल करते और रोज़ा जारी रखते थे। ” (सही बुखारी, सही मुस्लिम)

10.    दिन में सोने की स्थिति में स्पनदोष हो गया तो रोज़ा नहीं टूटेगा क्योंकि यह उस के शक्ति से बाहर है।

11.   पानी में नहाने और डुपकी लगाने से रोज़ा नहीं टूटता है। अगर्चे के कुछ विद्वानों इसे मक्रूह माना है।

12.   यदि पत्नी का पति गुस्से वाला हो तो नमक चखने के लिए खाना चख सकती हैं परन्तु कांठ (हलक) से निचे न पहुंचे।

13.   स्प्रेयर चिकित्सा के प्रयोग भी रोज़ा नहीं टूटता है।

इनके अलावा भी विद्वानों कुछ बातें बयान फरमाया जिस से रोज़े नहीं टूटता है। क्यों रोज़ा ईबादत है और रोज़े के भंग होने के लिए कुरआन और हदीस से दलील चाहिये।

अल्लाह की ओर से क्षमा और माफी का महीना रमजान

अल्लाह तआला रमज़ान महीने में अपनी क्षमा और दया का वर्षा करता है।  जिस कारण रमज़ान महीने में एक मुमिन का दिल खूशी और हर्षा से फूले नहीं समाता है, वह चाहता है कि अल्लाह से इस पवित्र महीने में अपनी गुनाहों , भूल चुक, अप्राधों की क्षमा कराले, (मानव अधिकार के अलावा), अल्लाह की नेमतों से अपनी झोली भर ले, जन्नन में प्रवेश होने का प्रमाण पत्र प्राप्त कर ले, जहन्नम से मुक्त होने का प्रमाण पत्र हासिल कर ले,

नेकियों पर उत्साहित करते हुए नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) फरमाते हैं,  ” रमज़ान की प्रथम रात को सरकश जिन और शैतान को जकड़ दिया जाता है , और  जन्नत ( स्वर्ग) के द्वार खोल दिये जाते हैं तो उस का कोई द्वार बन्द नही रहता तथा जहन्नम (नरक) के द्वार बन्द कर दिये जाते है और उस का कोई द्वार खुला हुआ नही होता और अल्लाह की ओर से पुकारने वाला पुकारता है , हे ! नेकियों के काम करने वालों , पुण्य के कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लो, और हे ! पापों के काम करने वालों , अब तो इस पवित्र महीने में पापों से रुक जा, और अल्लाह तआला नेकी करने वालों को प्रति रात जहन्नम ( नरक ) से मुक्ति देता है।” (सहीह उल जामिअ , अलबानी)

रोज़ा रखने का पुण्य बहुत ज़्यादा है और वास्तविक्ता यह हैकि कोई मानव रोज़े के पुण्य का कल्पना ही नहीं कर सकता है क्यों कि अल्लाह तआला ने रोज़ेदार को स्वयं बदला देने का वादा किया है और जिस वस्तु का बदला अल्लाह देगा वह बहुत ज़्यादा होगा जैसा कि हदीस क़ुद्सी में अल्लाह तआला फरमाता है। जैसा कि प्रिय रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया ” मनुष्य के हर कर्म पर, उसे दस नेकी से लेकर सात सौ नेकी दी जाती है सिवाए रोज़े के, अल्लाह तआला फरमाता है कि रोज़ा मेरे लिए है और रोज़ेदार को रोज़े का बदला दूंगा, उस ने अपनी शारीरिक इच्छा ( संभोग) और खाना – पीना मेरे कारण त्याग दिया, ( इस लिए इसका बदला मैं ही दूंगा) रोज़ेदार को दो खुशी प्राप्त होती है, एक रोज़ा खोलते समय और दुसरी अपने रब से मिलने के समय, और रोज़ेदार के मुंह की सुगंध अल्लाह के पास मुश्क (कस्तुरी) की सुगंध से ज़्यादा खुश्बूदार है।  ( बुखारी तथा मुस्लिम)

इसी तरह जन्नत ( स्वर्ग ) में एक द्वार एसा है जिस से केवल रोज़ेदार ही प्रवेश करेंगे, रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है, ” जन्नत ( स्वर्ग ) के द्वारों की संख्याँ आठ हैं, उन में से एक द्वार का नाम रय्यान है जिस से केवल रोज़ेदार ही प्रवेश करेंगे  ”

रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने साथियों को शुभ खबर देते हुए फरमाया ” तुम्हारे पास रमज़ान का महिना आया है,यह बरकत वाला महिना है,अल्लाह तआला तुम्हें इस में कृपा से ढ़ाप लेगा, तो रहमतें उतारता है, पापों को मिटाता है, और दुआ स्वीकार करता है और इस महीने में तुम लोगों का आपस में इबादतों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने को देखता है, तो फरिश्तों के पास तुम्हारे बारे में बयान करता है, तो तुम अल्लाह को अच्छे कार्ये करके दिखाओ, निःसन्देह बदबख्त वह है जो इस महिने की रहमतों से वंचित रहे.  ” ( अल – तबरानी)

रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया ” जो व्यक्ति रमज़ान महीने का रोज़ा अल्लाह पर विश्वास तथा पुण्य की आशा करते हुए रखेगा , उसके पिछ्ले सम्पूर्ण पाप क्षमा कर दिये जाएंगे ”      ( बुखारी तथा मुस्लिम)

रोज़ा और कुरआन करीम  क़ियामत के दिन अल्लाह तआला से बिन्ती करेगा के रोज़ा रखने वाले , कुरआन पढ़ने वाले को क्षमा किया जाए तो अल्लाह तआला उसकी सिफारिश स्वीकार करेगा, जैसा कि रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है ” रोज़ा और कुरआन करीम  क़ियामत के दिन अल्लाह तआला से बिन्ती करेगा कि ऐ रब, मैं उसे दिन में खाने – पीने और संभोग से रोके रखा तो मेरी सिफारिश उस के बारे में स्वीकार कर, कुरआन कहेगा, ऐ रब, मैं उसे रातों में सोने से रोके रखा तो मेरी सिफारिश उस के बारे में स्वीकार कर, तो उन दोनो की सिफारिश स्वीकार की जाएगी ” (मुस्नद अहमद और सही तरग़ीब वत्तरहीब)

फजर की आज़ान से पूर ही से खाने – पीने तथा संभोग से सुर्य के डुबने तक रुके रहने का नाम रोज़ा है। रोज़ा की असल हक़ीक़त यह कि मानव हर तरह की बुराई , झूट , झगड़ा लड़ाइ, गाली गुलूच, तथा गलत व्यवहार और अवैध चीज़ो से अपने आप को रोके रखे ताकि रोज़े के पुण्य उसे प्राप्त हो, जैसा कि रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है ” जो व्यक्ति अवैध काम और झूट और झूटी गवाही तथा जहालत से दूर न रहे तो अल्लाह को कोई अवशक्ता नही कि वह भूका और पियासा रहे ”  ( बुखारी )

यदि कोई व्यक्ति रोज़ेदार व्यक्ति से लड़ाइ झगड़ा करने की कोशिश करे तो वह लड़ाइ, झगड़ा न करे बल्कि स्थिर कहे कि मैं रोज़े से हूँ, जैसा कि रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है ” जब तुम में कोइ रोज़े की हालत में हो तो आपत्तिजनक बात न करे, जोर से न चीखे चिल्लाए, यदि कोइ उसे बुरा भला कहे या गाली गुलूच करे तो वह उत्तर दे, मैं रोज़े से हूँ। ”  ( बुखारी तथा मुस्लिम)

गोया कि रमज़ान महीने में अल्लाह तआला की ओर से दी जाने वाली माफी, अच्छे कर्मों से प्राप्त होनी वाली नेकियाँ, हम उसी समय हासिल कर सकते हैं जब हम रोज़े की असल हक़कीत के साथ रोज़ा रखेंगे और एक महीने की प्रयास दस महिने की कोशिश के बराबर होगी।

अल्लाह हमें और आप को इस महिने में ज्यादा से ज़्यादा भलाइ के काम, लोगों के कल्याण के काम, अल्लाह की पुजा तथा अराधना की शक्ति प्रदान करे ताकि हमारी झोली में पुण्य ही पुण्य हो,  आमीन