सब से पहले इस्लाम स्वीकार करने वाले व्यक्ति

अल्लाह तआला अपने सर्व नबियों और दूतों की जीवन प्रत्येक प्रकार की बुराइ से सुरक्षित रखता है। नबी बनाए जाने से पुर्व की जीवन और नबी होने का बाद की जीवन भी प्रत्येक प्रकार के दुर्आचार, दुर्व्यवहार, गंदे खेल कूद, मुर्ति पूजा और उसकी उपासना और बुरे कार्यों से सुरक्षित रखता है। ताकि जब यह मानव ईश्वर दूत होने की घोषणा करे, उस समय इस व्यक्ति का पुर्व जीवन लोगों के समक्ष हो, लोग इस नबी के व्यक्तिगत चरित्र, आचरण और व्यवहार को पूरी तरह जानते हो, उन से वह लोग पूरी तरह से संतुष्ठ हो, रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पूरी जीवन भी इन मक्का वासियों पर पूरी तरह प्रकट थीं और मक्का वासी आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को नबी बनाए जाने से पहले ही सच्चा और अमानतदार के उपाधि से पुकारते थे। कुछ महिनों के बाद अल्लाह तआला ने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को उसी फरिश्ते जिबरील के माध्यम से आदेश दिया कि अब तुम लोगों को अल्लाह की उपासना तथा इबादत की ओर निमंत्रण करो, लोगों को एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाओं, मुर्ती पुजा और अल्लाह के सिवा की पुजा से लोगों को मना करो और लोगों को आखिरत के दिन से सावधान करो और उन्हें बताओ कि अल्लाह ही सब से बड़ा और महान है,
जब रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने लोगों को एक अल्लाह की इबादत और उपासना की ओर निमन्त्रण की और अपने नबी और सन्देष्ठा होने की घोषना की। तो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर सब से पहले ईमान और विश्वास लाने वाली महिलाओं में आप रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पत्नी खदीजा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) हैं। परूषों में अबू बकर (रज़ी अल्लाहु अन्हु) हैं। गूलामों और दासों में ज़ैद बिन हारिसा (रज़ी अल्लाहु अन्हु) हैं और बच्चों में अली बिन अबी तालिब (रज़ी अल्लाहु अन्हु) हैं। रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने गुप्त तरीक़े और शांति के साथ लोगों को एक अल्लाह की इबादत और उपासना की ओर निमन्त्रण करना आरंभ कर दिया और जो लोग आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर ईमान लाते और एक अल्लाह की इबादत करने का प्रतिज्ञा कर लेते थे, उन्हें अरक़म के घर आने को कहते और इसी स्थान पर इस्लामी शिक्षा देते थे। इस तरह अरक़म का घर वह पहला इस्लामी विद्धयालय था जहां इस्लाम स्वीकार करने वालों को नमाज़ तथा इस्लाम का ज्ञान दिया जाता था।
इसी प्रकार तीन वर्ष बीत गये। आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की प्रयास और अबू बकर (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की कोशिश से लोग धिरे धिरे इस्लाम स्वीकार कर रहे थे।

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