इस्लाम सद्व्यवहार और ‘शांति का धर्म हैं।

April 29th, 2012 by safat alam taimi

जब अफगानिस्तान पर कब्जा करने के लिए अमेरिका तालिबान के खिलाफ एकतरफा तौर पर शस्त्र हिंसक और अमानवीय कार्यवाही लिप्त था, उसी दौरान तालिबान ने ब्रिटिश पत्रकार यओन्नी रिडले को गिरफ्तार कर लिया था। वे तालिबान के सैनिकों के बर्ताव एवं आचार-विचार से बहुत प्रभावित हुई और तालिबान द्वारा उन्हें रिहा करने के बाद उनमें इस्लाम को सीख‌ने-समझने की सहज अभिरूचि पैदा हुई । आखिरत गहन अध्ययन और चिन्तन के उपरान्त उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर दिया।

 

वे कहती हैं कि ईसराइल धर्म में कोई आकर्श्र्ण नहीं हैं। ब्रिटेन की वारविक यूनीवर्सिटी में १३ जनवरी २००३ को एक साधारण से कार्यक्रम में अपने इस्लाम धर्म में जाने का एलान करते हुए उन्होने कहा कि:

’’तालिबान के व्यवहार से ही मैं इस्लाम धर्म के अध्ययन की ओर उन्मुख हुई। इस्लाम सद्व्यवहार और ‘शांति का धर्म हैं।

सुनिए! आपका बच्चा आपसे क्या चाहता है?

April 29th, 2012 by safat alam taimi

 आप माता पिता बड़े “वह” हैं. छोटी गलतियों पर मुझे मारते पीटते रहते हैं बुरा भला कहते हैं दूसरों का गुस्सा भी मुझ पर निकालते हैं.ऐसा करते हुए आप भूल जाते हैं कि आप भी कभी बच्चे थे. मेरी इच्छा है कि आप अपने आप में परिवर्तन पैदा करें अपने क्रोध और भावनात्मक तरीके पर  नियंत्रण  रखें. क्योंकि मुझे आपकी मदद, दोस्ती, प्यार और मार्गदर्शन की जरूरत है. आई एक दूसरे को समझने की कोशिश करते हैं ताकि हंसते मुस्कुराते और एक दूसरे को समझते हुए जिंदगी गुजा़री जा सके. आपका बेटा / बेटी

 1. जब कोई अच्छा काम करूँ तो मुझे शाबाश ज़रूर दें. इससे मेरी हिम्मत बढ़ती हैं और खुशी का अहसास होता है.

 2. मुझमें ऐसी महारतें पैदा करें जो जिंदगी भर  मेरे साथ रहें.

 3. अपने वादे के पूरा करें क्योंकि जब आप किसी अच्छे काम पर मुझे पुरस्कार देने का वादा करते हैं, लेकिन नहीं देते तो मेरी नज़रों में आपका वह सम्मान नहीं रहता जो रहना चाहिए था।

 4. जब कोई गलती हो जाए तो मेरे साथ प्लीज़ चींख चिल्ला कर बात न करें. आपको लाल पीला देख कर मैं अपने आप को भयभीत और बिखरा बिखरा सा महसूस करता / करती हूँ.

 5. मेरी वर्तमान गलती के साथ पिछली गलतियों की सूची न दुहरायें बड़ों से भी गलतियां होती हैं. जबकि में तो अभी बच्चा हूँ.

 6. मुझे निकम्मा, मूर्ख और गदहा कहकर न पुकारें. क्या आपके शब्दकोश में मेरे लिए अच्छे शब्द नहीं.

 7. कभी कभी मेरे दोस्तों / सहेलियों को आयोजन के साथ खाने पर बुलाएँ हमारे इकट्ठे खाना खाने से मुझे प्रेम और भाईचारे का पाठ मिलता है.

 8. यदि संभव हो तो कम से कम एक समय का खाना मेरे साथ जरूर खाएं.

 9. मुझे अपने रिश्तेदारों के बारे में जानकारी दें और समय समय पर उनसे मुलाकात भी कराएं। 

 10. आप बड़े हैं और मैं छोटा. इसलिए मेरी गलतियों को क्षमा कर के अपने बड़ा होने का सबूत दें और अच्छी तरह से मेरी सुधार करें. ( शेष अगले पोस्ट में)

हमें किस धर्म का पालन करना चाहिए ?

April 29th, 2012 by safat alam taimi

धर्म के सम्बन्ध में कोई जबर्दस्ती नहीं। हाँ! इस विषय पर र्वाता अवश्य होनी चाहिए। वास्तविकता यह है कि

 यह प्रश्न ही बेकार है कि हमें किस धर्म को मानना चाहिएक्यों कि धर्म तो ईश्वर की ओर से एक ही आयाहैअनेक नहीं। वह  कैसे इस लिए कि :

(1) हमारा ईश्वर एक है अनेक नहीं। 

(2) हम सब की रचना एक ही प्रकार से होती आ रही है अन्य प्रकार से नहीं।

(3) हम सब एक ही प्रकार की धातु (वीर्य) से बनते है। 

(4) तथा हम सब एक ही (प्रथम) माता पिता की संतान हैं। 

तो फिर धर्म अलग अलग कैसे हो सकता है लेकिन आज हम अलग अलग धर्म देख रहे हैं इस लिए आज उन धर्मों में से मुक्ति के लिए किसी एक धर्म का चयन करने की आवश्यकता है। लेकिन यहाँ समस्सया यह है कि आज हर धर्म के मानने वाले अपने धर्म को सत्य मान रहे हैं तो इस सम्बन्ध में मापदण्ड क्या हो सकता है… आइए देखते हैं…

(1) पहली बात यह है कि उस धर्म ने एक ईश्वर की कल्पना सिद्ध की हो। 

(2) दूसरी बात यह है कि उसका एक संदेष्टा हो जिसकी जीवनी पूर्ण रूप में शुद्ध एवं उजव्वल हो। वह भी 

स्वयं को मानव के रूप में पेश करता होंईश्वर के रूप में नहीं। 

(3) तीसरी बात यह है कि उस धर्म का ग्रन्थ हर प्रकार के विभेद से पाक हो जिसको चुनौति न दी जा सकती हो। 

(4) चौथी बात यह है कि उस धर्म ने एक पूर्ण जीवन व्यवस्था पेश किया हो। अर्थात उसका सम्बन्ध जीवन के प्रत्येक भाग में हो। 

(5) पाँचवीं बात यह कि उस शिक्षा के आधार पर हर युग में एक शान्तिपूर्ण समाज की स्थापना हो सकती हो । 

(6) छट्ठी बात यह कि उस धर्म ने मानव को विभिन्न जातियों में विभाजित न किया हो। और सब को बराबर का अधिकार प्रदान करता हो ।

 यह गुण जिस धर्म में पाए जाएं वही धर्म “मानव धर्म” हो सकता है।

एक पुजारी का किस्सा

February 29th, 2012 by safat alam taimi
एक व्यक्ति के तीन बेटों ने मुर्ति-पूजा छोड़ कर एक ईश्वर की पूजा शुरू कर दी थी। पिती मुर्तियों का बहुत बड़ा पुजारी था। अपने घर के मंदिर में सुबह शाम मुर्ति की पूजा करता था। इसी लिए वह हर समय भयभित रहता कि ऐसा न हो कि हमारे घर पर भगवाग की शराप पड़ जाए। एक दिन वह भगवान के पास गया और भगवान को इन शब्दों में सम्बोधित कियाः देवता जीः आप जानते हैं कि हमारे समाज में एक व्यक्ति आ गया है जो लोगों को अपने पूर्वजों के धर्म से काट कर एक अलग धर्म की ओर बुला रहा है, वह आपका सब से बड़ा विरोद्धी है… हमें इस सम्बन्ध में कुछ परामर्श दीजिए कि क्या किया जाए उसके साथ। मुर्ति में जीव कहाँ कि उत्तर दे…पुजारी थोड़ी देर प्रतीक्षा किया…फिर कहने लगा कि शायद आप हम से क्रोधित हैं, ठीक है…आपका क्रोध ठंडा होने तक हम आपको कुछ न कहेंगें। उसी रात पुजारी के बेटों ने रात में घर के मंदिर से मुर्ति को अपने कंधों पर उठाया और गंदगी के ठेर और सड़े हुए मुर्दार कुवें में फेंक दिया। सुबह सवेरे जब स्नान करके घर के मंदिर में पूजा पाट के लिए गए तो मुर्ति को गुम पा कर ज़ोर से चींख मारी। किस कमीने ने हमारे देवता की चोरी की है…परिवार के लोग चुप रहे। फिर वह परेशानी की हालत में खोजते हुए बाहर निकले तो मुर्ति को देखा कि उल्टे मुंह कुवें में गिरा पड़ा है। तुरन्त वहाँ से निकाला, उसे धुला और खुशबू लगा कर फिर उसी स्थान पर रख दिया। दूसरी रात उनके बेटों ने फिर वैसा ही किया और उसे कुवें के पास गंदगी में फेंक दिया। सुबह जब पूजा के लिए घर के मंदिर में गए तो मुर्ति को न पा कर सख्त क्रोधित हुए। फिर जब खोजते हुए कुवें के पास पहुंचे तो पहले ही दिन के जैसे गंदगी में उल्टे मुंह गिरा देखा। प्रेम से उठाया और धुल कर, खुशबू लगाकर मंदिर में रख दिया।
उसके बेटे हर रात ऐसा ही करने लगे। जब मआमला हद से आगे बढ़ गया तो पुजारी एक दिन रात में सोने से पहले उसके पास गया और कहाः ऐ देवता! खेद है तुम पर, बकरी का बच्चा भी अपनी पीठ पर होने वाले आक्रमण को रोकता है, फिर उस बुत की गर्दन में एक तलवार लटका दी और कहाः इस तलवार के द्वारा अपने शत्रु से अपनी सुरक्षा करना। जब रात का अंधेरा छा गया तो उसके बेटों ने बुत को उठाया, उसकी गर्दन में एक मुर्दार कुत्ता बाँधा और उसी गंदे कुवें में फेंक आए। जब सुबह हुई और पुजारी बुत को खोजते हुए कुवें के पास पहुंचे तो उसकी दयनिय स्थिति देख कर कहाः
ورب يبول الثعلبان برأسه    لقد ذل من بالت عليه الثعالب
ऐसा देवता कि जिसके सर पर लोमड़ी पेशाब करे… वह कितना अपमानित और विवश है…जिस के सर पर लोमड़ियाँ पेशाब करती हों।
यह कह कर तुरन्त मुसलमान हो गए और अपने बेटों के साथ एक अल्लाह की पूजा में लग गए। इतिहास में इस पुजारी का नाम “अमर बिन जमूह” है।

इस्लाम में आज़ादी की धारणा

February 25th, 2012 by safat alam taimi

kuwait kids इस्लाम में आज़ादी की धारणा हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि वह आज़ाद रहे और उसकी आज़ादी को कोई चुनौति देने वाला न हो, इसी प्राकृतिक भावना का सम्मान करते हुए इस्लाम ने मानव को पूर्ण रूप में स्वतंत्रता दी है। इनसान बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था तथा बुढ़ापा तात्पर्य यह कि उमर के प्रत्येक चरणों में आज़ाद होता है।

आज़ादी का महत्वः आज़ादी के महत्व का सही अनुभव वही कर सकता है जो स्वतंत्र वातावरण में जीवन बिताने के बाद गुलामी की ज़ंजीरो में जकड़ा हुआ हो। इसी लिय इस्लाम ने आज़ादी पर बहुत बल दिया, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (रहि0) लिखते हैः

“इंसानों को इंसानों की गुलामी से मुक्ति दिलाना इस्लाम का ईश्वरीय उद्देश्य है।” (तहरीके आजादी पृष्ठ14)

मौलाना दूसरे स्थान पर लिखते हैं:

“इस्लाम ने ज़ाहिर होते ही यह घोषणा की कि सत्य शक्ति नहीं बल्कि स्वयं सत्य है, और अल्लाह के अतिरिक्त किसी के लिए उचित नहीं अल्लाह के दासों को अपना अधीन और दास बनाए।” (क़ौले फस्ल पृष्ठ50)

मौलाना आज़ाद ने मुसलमानों का नेतृत्व करते हुए मात्र दो ही रास्ते अपनाने की दावत दी है, आज़ादी या मौत, अतःवह पूरे निर्भयता से कहते हैं: “इनसानों के बुरे व्यवहार से किसी शिक्षा की वास्तविकता नहीं झुटलाई जा सकती। इस्लाम की शिक्षा उसके ग्रन्थ में मौजूद है। वह किसी स्थिति में भी वैध नहीं रखती कि स्वतंत्रता खो कर मुसलमान जीवन बिताए।मुसलमानों को मिट जाना चाहिए।

तीसरा रास्ता इस्लाम में कोई नहीं” (क़ौले-फैसल, 63-64)

सामान्य कामों में इंसान आज़ाद हैः अल्लाह ने इंसान को सामान्य कामों में पूरी आज़ादी दी, जो चाहे खाए, जो चाहे पहने, जहाँ चाहे जाए, जो काम चाहे अपनाए, जो चाहे खरीदे और जो चाहे बेचे। इस आज़ादी में महिला और पुरुष समान हैं, शादी विवाह में भी मर्द और औरत स्वतंत्र हैं कि जिन से चाहें शादी करें यहाँ तक किसी लड़की की अनुमति के बिना उसकी शादी भी नहीं की जा सकती। उसी तरह हर प्रकार की वैज्ञानिक खोज की आज़ादी है कि जिस चीज़ की चाहे खोज करे।

आज़ादी की धारणा इस्लाम के अधीन हैः इस्लाम ने इंसान को आज़ादी ज़रूर दी है लेकिन इस आज़ादी को अल्लाह और उसके आदेशों के अधीन कर दिया है बिल्कुल आज़ाद नहीं छोड़ा। अल्लाह तआला का फरमान हैः

” और (देखो) किसी मोमिन मर्द और मोमिन औरत के लिए अल्लाह और उसके रसूल के फैसला के बाद अपने किसी मआमले का कोई अधिकार बाक़ी नहीं रहता,(याद रखो) अल्लाह तआला और उसके रसूल की जो भी अवज्ञा करे वह खुली गुमराही में पड़ेगा।”( अल-अहज़ाब 36)

इस लिए अल्लाह और उसके रसूल ने जिन कामों के करने का आदेश दिया उन्हें करना और जिन कामों से रोक दिया उन से रूक जाना ही आज़ादी का सही इस्तेमाल है। अतः एक व्यक्ति को यह आज़ादी नहीं दी जा सकती कि अल्लाह के किसी आदेश को छोड़ दे या उसके मनाही का उलंधन करने लगे। आज़ादी के नाम पर दीन का मज़ाक उड़ाना, अल्लाह और उसके रसूल के बारे में अपशब्द का प्रयोग करना और इस्लाम के किसी आदेश को दिल से ना-पसंद करना जायज़ नहीं। बल्कि ऐसा करने वाला इस्लाम की सीमा से निकल जाता है। उसी प्रकार अगर मर्द और औरत व्यभीचार के लिए आपस में राज़ी हो जाएं तो व्यभीचार जायज़ नहीं हो जाता। और अगर सूद का लेन देन करने वाले आपस में राज़ी हों तो सूद जायज़ नहीं हो सकता।

गुलामी मात्र अल्लाह कीः अल्लाह को यह बात कदापि प्रिय नहीं कि उसकी सृष्टि किसी और की दासता में रह कर जीवन बिताए। कारण यह है अल्लाह सृष्टा है तो वह अपनी प्रत्येक सृष्टि से दासता का मुतालबा स्वयं अपने लिए करता है और अपने दासों को अपनी दासता में देखना चाहता है। क्योंकि उसने सम्पूर्ण जीव-जातियों को पैदा ही नहीं किया है वरन् उन पर विभिन्न प्रकार का उपकार भी किया है। तथा उन सब का संरक्षण भी कर रहा है। जब उसी ने संसार को रचाया, उसी ने हर प्रकार का अपकार किया, वही संसार को चला रहा है तथा संसार की अवधि पूर्ण होने के पश्चात वही संसार को नष्ट भी करेगा तो मानव को प्राकृतिक रूप में उसी की दासता में रहना चाहिए। और उसके अतिरिक्त हर प्रकार की दासता को नकार देना चाहिए।

अल्लाह की गुलामी में आ जाने के बाद एक इंसान हर तरह की गुलामी से आज़ाद हो जाता है। इसी लिए सहाबाए किराम जब किसी देश में जाते तो लोगों तब अल्लाह का संदेश पहुंचाते हुए कहते थेः “हमें अल्लाह ने इस लिए भेजा है ताकि हम लोगों को मानव की पूजा से मुक्ति दिला कर अल्लाह की पूजा की ओर लाएं” ।

जब मिस्र के गवर्नर अमर मिन आस रज़ि0 के बेटे ने एक मिस्री की बिना किसी कारण के पिटाई कर दी तो मिस्री ने उस समय के खलीफा हज़रत उमर फारूक़ रज़ि0 के पास इस की शिकायत की, खलीफा ने गवर्नर और उनके बेटे को मदीना बुलाया, फिर मिस्री से कहाः मेरे सामने तुम गवर्नर के बेटे से वैसे ही बदला ले लो, जिस तरह उसने तुम्हारी पिटाई की है। फिर फरमायाः “तुम ने लोगों को कब से गुलाम बना लिया जब कि उनकी माओं ने उन को आज़ाद पैदा किया था”।

अली रजि0 ने फरमायाः”अल्लाह ने तुझे आज़ाद पैदा किया है इस लिए किसी अन्य की दासता स्वीकार मत करो।”

गुलामी के कुछ आधुनिक तरीक़ेः संसार जब प्रगति के युग में दाखिल हुआ तो गुलामी की विभिन्न शल्कें ज़ाहिर होने लगीं। इस्लाम दुश्मनों ने आज़ादी के नाम पर गुलामी के बहुत सारे तरीक़े आम किए ताकि लोग उनके ख्यालात से सहमत हो जाएं फिर वह जैसे चाहें लोगों को फेरते रहें। इस प्रकार आज़ादी के नाम पर गुलामी की धारणा को फैलाया जाने लगा। अतः कुछ लोग सहवास के गुलाम बन गए कि सहवास ही उन्हें हर्कत देने लगी, उठाने बैठाने लगी। कुछ लोग रूपय पैसे के गुलाम बन गए कि दीन से बे-परवाह हो कर दुनिया कमाने में पूरी तरह व्यस्त रहने लगे। कुछ लोग ड्रग्स के ऐसे गुलाम बन गए कि अपनी जवानी और दौलत तक को गंवा बैठे।

यह कहना कि दूसरों को हानि पहुंचाए बिना जो चाहो करोः यह धारणा बिल्कुल गलत है। क्योंकि इस का अर्थ यह हुआ कि सिग्रेट पीना हराम इस लिए है कि इस से दूसरों को कष्ट पहुंचता है, अब अगर कोई एकांत में सिग्रेट पीता है तो उसे अनुमति मिलनी चाहिए। कोई बन्द कमरे में अल्लाह की अवज्ञा करता है तो उसे सही समझना चाहिए…

अल्लाह की क़सम! यह शैतानी फरेब है। इंसान एकांत में भी आज़ाद नहीं होता, वहाँ भी अल्लाह की निगरानी उसके साथ होती है और उसके दायें बायें कंधों पर फरिश्ते  निगरानी कर रहे होते हैं।

बंधुआ मज़दूरीः गुलामी की एक भ्यानक प्रथा जो आज तक दुनिया में चली आ रही है,बंधुआ मज़दूरी है। भारत और पाकिस्तान सहीत विश्व के विभन्न देशों में बंधुआ मज़दूरी की यह बुरी रस्म एक संगीन समस्या के रूप में मौजूद है। इस सम्बन्ध में इस्लाम ने वे उसूल दिए जिन से बंधुआ मज़दूरी के उन्मूलन में मदद मिलती हैः

सब से पहले इस्लाम ने जुल्म से रोक दिया। उसी प्रकार इस्लाम किसी को भी क्षति पहुंचाने की मनाही करता है। इस्लाम में जीवन का आनन्द किसी विशेष जाति तक सीमित नहीं है बल्कि सारे इनसान चूंकि अल्लाह के बन्दे और आदम व हव्वा की औलाद हैं इस लिए जीवन के आनन्द से आनन्दित होना हर एक का अधिकार है। औऱ किसी आज़ाद इंसान को उसकी आज़ादी से वंचित करना जायज़ नहीं। न यह जायज़ है कि किसी इंसान को ज़बरदस्ती रोक लिया जाए या उस से उसकी इच्छा के विरूद्ध काम लिया जाए। बल्कि इस्लाम ने तो मज़दूरों के साथ सद्व्यवहार करने की ताकीद की। मज़दूर का पसीना सूखने से पहले मज़दूरी देने का आदेश दिया।(इब्नेमाजा) इस बात का भी आदेश दिया कि मज़दूरी पूरी पूरी दी जाए उसमें कोई कमी न की जाए, अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने फरमाया कि “मैं एसे व्यक्ति के खिलाफ क़ियामत के दिन वादी बन कर खड़ा हूंगा जो किसी मज़दूर को मज़दूरी पर रखे और उस से पूरा पूरा काम ले परन्तु उसकी मज़दूरी(पूरी पूरी) न दे”। (बुखारी) इस्लाम ने इस बात का भी आदेश दिया है कि मज़दूर से मज़दूरी तै कर के ही काम लिया जाए, मुहम्मद सल्ल0 की हदीस हैः “जो कोई किसी मज़दूर को मज़दूरी पर रखे तो चाहिए कि उसकी मज़दूरी को पहले बतादे।” (आसारुस्सुनन)

यह शिक्षाएं इस लिए दी गईं ताकि धनवानों से शोषण की मानसिकता समाप्त हो।

कुवैत का राष्ट्रीय दिवस और स्वतंत्रता दिवस: 25, 26 फरवरी कुवैत के राष्ट्रीय दिवस और स्वतंत्रता दिवस की परम तिथि है। इतिहास के विभिन्न चरणों में कुवैत की सम्पत्ति पर कब्जा जमाने के प्रयास हुए, अपनों और बेगानों दोनों ने हाथा-पाई की। कभी उस्मानिया हुकूमत ने लालच के फन फैलाए तो कभी पश्चिमी देशों के मुँह में पानी आया, सब से अन्त में इसी प्रकार का आक्रमण   23वर्ष पहले हुआ था, जिस में कुवैत वासियों ने बड़ा बलिदान पेश किया। कितनी जानें गईं, और कितने माल बर्बाद हुए, अंततः दुश्मनों को मुंह की खाना पड़ी।

अल्लाह का शुक्र है कि आज देश आजाद है, भलाई के कार्यों में प्रथम दल गिना जाता है और हम प्रवासी इस देश के शांतिपूर्ण वातावरण में रह कर अपनी आर्थिक स्थिति को मज़बूच कर रहे हैं। इस देश से वफादारी की मांग है कि हम कुवैत-वासियों की खुशी को अपनी खुशी समझें और उन के ग़म को अपना ग़म ख्याल करें।

इस्लाम और जनसेवा

February 18th, 2012 by safat alam taimi

मानव की सेवाः एक दिन मुहम्मद सल्ल0 ने अपने साथियों से फरमायाः अल्लाह की क़सम वह व्यक्ति मोमिन नहीं है। अल्लाह की क़सम वह कभी मुमिन कहलाने के योग्य नहीं। अल्लाह की क़सम ऐसे व्यक्ति का ईमान सही नहीं। साथी आश्चर्यचकि और प्रश्न करने पर विवश कि आखिर वह कौन दुर्भाग्य व्यक्ति होगा जिसके मोमिन न होने की गवाही अल्लाह के रसूल सल्ल0 तीन तीन बार क़सम खा कर दे रहे हैं: उत्तर में आप सल्ल0 ने फरमायाः वही जिसके पड़ोसी उसके कष्टों से सुरक्षित नहीं रह पाते हैं। ( बुखारी,मुस्लिम)

ज्ञात होना चाहिए कि पड़ोसी मात्र वही नहीं है जिसका घर आपके घर से लगा हुआ हो अथवा आमने सामने हो अपितु पड़ोसी दुकान में भी होता है, कम्पनी और बस, ट्रेन में भी होता है। उन सब की भावनाओं का ख्याल रखना आवश्यक है वरना मुहम्मद सल्ल0 को तीन तीन बार क़सम खा कर घोषणा करने की आवश्यकता ही क्या थी। दूसरी बात यह है कि इस प्रवचन में पड़ोसी कहा गया है जो हिन्दु, ईसाई, यहूदी कोई भी हो सकता है सब के साथ में दया और प्रेम का व्यवहार करना ज़रूरी है।

एक हदीसे क़ुद्सी में अल्लाह इनसानों से पूछेगाः मैं भुका था तुने मुझे खिलाया क्यों नहीं, मैं प्यासा था, मैं बे-लेबास था, मैं बीमार था। इनसान आश्चर्य से पूछेगाः हे अल्लाह ! सारी सृष्टि को खिलाने, पिलाने, पहनाने और स्वास्थ्य देने वाला तू है, तू कैसे भूखा, प्यासा और बीमार हो सकता है ? फरमाएगाः “मेरा फलाँ बन्दा ऐसा था, यदि तू उसकी आवश्यकता पूरी करता तो तू मुझे वहाँ पाता।” ( मुस्लिम)

इस्लामी शिक्षाओं में समाज के प्रत्येक व्यक्ति की रिआयत की गई हैं कि हमारी किसी बात से अथवा कार्य से किसी का दिल न टूटे और वह मिथ्या संदेह में न पड़े। इसी लिए मुहम्मद सल्ल0 ने फरमाया कि यदि कहीं पर तीन व्यक्ति हों तो दो व्यक्ति परस्पर हल्के से बातें न करे क्यों कि तीसरे आदमी के दिल में यह गुमान गुज़र सकता है कि शायद मेरे ही सम्बन्ध में बातें हो रही हैं।

निर्जीव की सेवाः ज़माने को बुरा भला कहने से रोक दिया गया। पानी के महत्त्व को बतलाकर समुद्र में भी अधिक पानी के प्रयोग से मना किया गया। ज़मीन की सेवा यह बताई गई कि इस पर विनम्रता के साथ चला जाए और अकड़ कर सीना तान कर चलने से रोक दिया गया।

वनस्पति की सेवाः इस्लाम ने छायादार वृक्ष की सुरक्षा पर बड़ा बल दिया। उसकी क्षाया में गंदगी फैलाने और पेशाब पाखाने के लिए प्रयोग करने को लानत ठहराया। (मुस्लिम)

जब चीन ने एक व्यक्ति एक वृक्ष का नियम लागू किया तो लोगों ने इसे सराहनिय भुमिका सिद्ध किया जब कि आज से साढ़े चौदह सौ वर्ष पर्व मुहम्मद सल्ल0 ने फरमाया था कि “यदि क़यामत का समय आ जाए और तुम में से किसी के हाथ में खजूर के पौधे हों और वह महा-प्रलय के बरपा होने से पहले पौधे को लगा सकता हो तो लगा दे क्योंकि उसे इसके बदले पुण्य मिलेगा।” (सही जामिअ़ हदीस संख्या 1424).

पशु-पक्षियों की सेवाः इस्लाम ने बिना किसी उद्देश्य के पशु-पक्षियों को निशाना बनाने से मना किया।( मुस्लिम) जानवरों को भूका प्यासा रखना और उनसे उनकी ताक़त से बढ़ कर काम लेना अपराध ठहराया गया। मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों में आता है कि एक इबादतगुज़ार महिला ने बिल्ली को बाँध कर रख दिया. और उसे खाने पिने के लिए आज़ाद नहीं किया और न अपनी ओर से उसके खाने पीने का व्यवस्था किया इस अत्याचार के बदले वह नरक में गई। जबकि एक वैश्या के सम्बन्ध में मुहम्मद स्ल्ल0 ने फरमाया कि उसने एक कुत्ते को देखा जो प्यास के कारए ऐसे हाँप रहा था कि मर ही जाएगा, उसने अपना मोज़ा निकाला और उसे अपनी ओढ़नी से बाँधा, कुंवें से पानी निकाल कर कुत्ते को पिलाया, उसके इस पुनय के कारण उसे क्षमा कर दिया गया।

आवश्यकता से अधिक जल रोक लेना सही नहीं।

December 15th, 2011 by safat alam taimi

water lust why all the ex 1 आवश्यकता से अधिक जल रोक लेना सही नहीं।आवश्यकता से अधिक जल रोक लेना सही नहीं क्योकि जल ही जीवन है और यह यह बात याद रखें कि संसार के रचयिता ने मानव लाभ हेतु संसार में विभिन्न प्रकार की सामग्रियाँ पैदा की हैं जिन से मानव लाभांवित होता है। उनमें में से कुछ पर मानव अपना अधिकार रखता है तो कुछ सार्वजनिक रूप में सब के प्रयोग के लिए हैं जैसे चन्द्रमा, सूर्य, हवा और जल आदि।

मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों में ऐसे विभिन्न आदेश मिलते हैं जिन से ज्ञात होता है कि आवश्यकता से अधिक पानी रोक लेना सही नहीं। उदाहरण-स्वरूप हम कुछ प्रवचन पेश करते हैं:

(1) मुहम्मद सल्ल0 ने आवश्यकता से अधिक पानी रोक लेने से मना किया। ( मुस्लिम)

(2)   ” आवश्यकता से अधिक पानी रोका नहीं जा सकता कि इस से हरयाली को हानि पहुंचती है।” (बुखारी, मुस्लिम)

(2) ” जिसने आवश्यकता से अधिक पानी अथवा हरयाली रोक ली अल्लाह कल क्यामत के दिन उसका रिज्क रोक देगा। ” ( मुस्नद अहमद)

पानी को ईश्वर ने मानव और पशु पक्षि सब के लिए समान रूप में पैदा किया है और उन सब की सैराबी का उसे माध्यम बनाया है। इस लिए यदि पानी सार्वजिक स्थान पर हो तो किसी के लिए उसे रोक लेना सही नही। हाँ यदि कोई पानी उठा कर ले जाता है तो वह उस पर अधिकार अवश्य रखता है परन्तु अगर आवश्यकता से ज्यादा है तो उसके लिए इसे भी रोक लेना सही नहीं।

आत्म-हत्या की बढ़ती हुई मानसिकता और उसका समाधान

December 15th, 2011 by safat alam taimi

2 आत्म हत्या की बढ़ती हुई मानसिकता और उसका समाधानइस समय दुर्भाग्य से पूरी दुनिया में आत्म-हत्या का रुजहान बढ़ता जा रहा है। पश्चिमी देशों में सामाजिक व्यवस्था के बिखराव के कारण समय से आत्म-हत्या की बीमारी प्रचलिम है। भारत सरकार की तत्कालिन रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर एक घंटे में आत्म-हत्या की पंद्रह घटनाएं पेश आती हैं। खेद की बात यह है कि आत्म-हत्या की इन घटनाओं में एक अच्छी खासी संख्या पढ़े लिखे और उच्च शिक्षित युवकों की है । सप्ताह में चार पाँच दिन दैनिक अख़बारों में ऐसी ख़बरें मिल ही जाती हैं जिनमें महिलाओं की आत्म-हत्या का वर्णन होता है, यह घटनायें सामान्य रूप में ससुराल वालों के अत्याचार और पैसों के न खत्म होने वाली मांगों के कारण पेश आती हैं। ऐसे मां बाप की मौत भी अनोखी बात नहीं रही जो अपनी गरीबी के कारण अपनी बेटियों के हाथ पीले करने में असमर्थ हैं और ज़ालिम समाज ने उन्हें सख्त मानसिक तनाव में ग्रस्त किया हुआ है।
इसका कारण क्या है? और इसका समाधान कैसे सम्भव हो सकता है? आइए इस्लामी दृष्टिकोण से इस विषय पर विचार करते हैं:
मनुष्य पर अनिवार्य है कि वह संभवतः अपनी जान की सुरक्षा करे, क्योंकि जीवन उसके पास ईश्वर (अल्लाह) की अमानत है और अमानत की सुरक्षा करना हमारा नैतिक और मानवीय दायित्व है। इसलिए इस्लाम की निगाह में आत्म-हत्या बहुत बड़ा पाप और गंभीर अपराध है। ऐसा पाप जो उसे दुनिया से भी वंचित करता है और परलोक से भी । खुद कुरआन ने आत्म-हत्या से मना फ़रमाया हैः अल्लाह (ईश्वर) का आदेश है:”अपने आप को क़त्ल मत करो”( सूरः अन्निसा: 29) और अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 के विभिन्य प्रवचनों में आत्म-हत्या का खंडन किया गया और बहुत सख्ती और बल के साथ आत्म-हत्या से मना किया गया है। आपने फरमायाः “जिसने अपने आप को पहाड़ से गिरा कर आत्म-हत्या की वह नरक की आग में भी इसी तरह हमेशा गिरता रहेगा और जिस व्यक्ति ने लोहे की हथियार से खुद को मारा वह नरक में भी हमेशा अपने पेट में हथियार घोंपता रहेगा।”(बुखारी)
एक दूसरे स्थान पर आपका आदेश हैः”गला घोंट कर आत्महत्या करने वाला नरक में हमेशा गला घोंटता रहेगा और अपने आप को भाला मार कर हत्या करने वाला नरक में भी हमेशा अपने आप को भाला मारता रहेगा।” (बुखारी)
क़ुरआन और मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों से अनुमान किया जा सकता है कि आत्म-हत्या इस्लाम की निगाह में कितना गंभीर अपराध है। यह वास्तव में जीवन की समस्याओं और मुश्किलों से भागने का रास्ता अपनाना है और अपनी ज़िम्मेदारियों से भाग निकलने का एक अवैध और अमानवीय उपाय है।
जो व्यक्ति अल्लाह पर विश्वास रखता हो, वह दृढ़ विश्वास रखता हो कि ख़ुदा समस्याओं की काली रात से आसानी और उम्मीद की नई सुबह पैदा कर सकता है, जो व्यक्ति भाग्य में विश्वास रखता हो कि खुशहाली और तंगी संकट और तकलीफ़ अल्लाह ही की ओर से है । धैर्य और संतोष मनुष्य का कर्तव्य है और जो परलोक में विश्वास रखता हो कि जीवन की परेशानियों से थके हुए यात्रियों के लिए वहाँ राहत और आराम है। ऐसा व्यक्ति कभी आत्म-हत्या की मानसिकता नहीं बना सकता।
आज आवश्यकचा इस बात की है कि आत्म-हत्या के नैतिक और सामाजिक नुकसान लोगों को बताए जाएं। समाज के निर्धनों और मकज़ोरों के साथ नरमी और सहयोग का व्यवहार किया जाए। घर और परिवार में प्रेम का वातावरण स्थापित किया जाए। बाहर से आने वाली बहू को प्यार का उपहार दिया जाए, रिती रिवाज की जिन जंजीरों ने समाज को घायल किया है, उन्हें काट फेंका जाए। शादी, विवाह के कामों को सरल बनाए जाएं और जो लोग मानसिक तनाव में ग्रस्त हों और समस्याओं में घिरे हुए हों उनमें जीने और समस्याओं और संकट से मुक़ाबला करने की साहस पैदा की जाए।

हर बात को आप धार्मिक चश्में से क्यों देखते हैं ?

December 15th, 2011 by safat alam taimi

world map हर बात को आप धार्मिक चश्में से क्यों देखते हैं ?कुछ सज्जन यह कहते हैं कि आखिर कुछ लोग हर बात एवं घटना को धार्मिक चश्मे से देख कर उसे धार्मिक
रंग में क्यों रंग देते हैं।” इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म एक व्यक्तिगत मआमला है, इसे सार्वजनिक रूप नहीं देना चाहिए, परन्तु मैं एक मुस्लिम की हैसियत से इस बात से सहमत नहीं, मैं एक धार्मिक व्यक्ति हूं। और धर्म एक इनसान की प्रकृति में शामिल है। हम सब का पैदा करने वाला ईश्वर जो एक है जिसके समान कोई नहीं, न उसका कोई भागीदार है, न उसे मानव रूप धारण करके पृथ्वी पर अवतरित होने की आवश्यकता पड़ती है। हाँ ! यह सत्य है कि उसने मानव की रचना करने के बाद उसे यूं ही छोड़ नहीं दिया कि जैसे चाहे अपनी इच्छानुसार जीवन बिताए अपितु मानव में से ही क्रान्तिकारी मनुष्यों को चयन कर के उनका मार्गदर्शन किया, जिनको अवतार अथवा संदेष्टा कहते हैं, वह हर युग और हर देश में आते रहे, जिनकी संख्या एक लाख तक पहुंचती है। उनको अपने अपने देश तथा समाज हेतु भेजा जाता था।
परन्तु जब सातवीं शताब्दि ईसवी में यातायात के साधन ठीक हो गए। तथा एक देश का दूसरे देश से सम्पर्क होने लगा तो सम्पूर्ण संसार हेतु अन्तिम अवतार भेजे गए जिन पर क़ुरआन का अवतरण हुआ जो सारे मानव को सम्बोधित करता हैं। उन्हें हम मुहम्मद कहते हैं। कुरआन लोगों को विभिन्न जातियों में विभाजित नहीं करता अपितु एकत्र करता है। उसका सार मात्र एक ईश्वर की पूजा और मानव भाई चारा है। क़ुरआन के अनुसार सारे मानव की उत्पत्ति एक ही मानव आदम औऱ हव्वा से हुई है और उन सब का बनाने वाला भी एक ही है। इस प्रकार इस्लाम मानव का धर्म है परन्तु खेद की बात यह है कि अधिक लोग अपने ही परम धर्म से वंचित हो कर इधर उधर भटक रहे हैं। आज ईश्वर का नाम तो सब लेते हैं परन्तु उसे पहचानते बहुत कम लोग हैं।
यह भी सत्य है कि हम सब एक दिन अपने पैदा करने वाले के पास पहुँचने वाले और इस जीवन का लेखा जोखा देने वाले हैं, जिसके आधार पर ही हमारे स्वर्ग अथवा नरक का निर्णय किया जाएगा।
यदि हमें इन बातों का ज्ञान है जो सब को सत्य की ओर अग्रसर कर सकती हैं, और हम इन्हें छुपाएं अथवा बयान करने से संकोच करें तो मैं अपने भाईयों का शुभ-चिंतक नहीं बन सकता।

क्या इस्लाम काफिरों को मारने का आदेश देता है ?

December 8th, 2011 by safat alam taimi

peace dove med res क्या इस्लाम काफिरों को मारने का आदेश देता है ?कुछ सज्जन कुरआन में युद्ध की आयतों को पढ़ कर यह परिणाम निकालते हैं कि कुरआन हिंसा की ओर बोलाता है। उदाहरणस्वरूप क़ुरआन में कुछ स्थानों पर इस प्रकार की बातें कही गई हैं कि काफिरों को जहाँ पाओ उन्हें क़त्ल कर दो….. ज़ाहिर है कि जिस धर्म का अर्थ ही शान्ति होता हैं। और जिस धर्म नें किसी गैर मुस्लिम की अकारण हत्या को सम्पूर्ण मानव की हत्या सिद्ध की है (सूरः माइदा आयत 32) और जिस धर्म के अन्तिम सन्देष्टा की शिक्षा है कि ” जो व्यक्ति इस्लामी देश में रहने वाले किसी गैर मुस्लिम की अकारण हत्या कर देता है वह स्वर्ग की हवा तक न पाएगा ” ( बुखारी हदीस न0 3166) उस धर्म के ग्रन्थ में ऐसी आयतों का पाया जाना अलग ही अर्थ रखता होगा…. अब प्रश्न यह है कि इसका क्या अर्थ हो सकता है ? यह बात नोट करें कि इन आयतों का सम्बन्ध सामान्य स्थिति से नहीं है अपितु उनमें युद्धस्तर के सम्बन्ध में आदेश दिया गया है। युद्ध की स्थिति में कोई भी पक्ष दूसरे पक्ष की रिआयत नहीं करता। हिन्दू धर्मिक ग्रन्थों में सैकरों ऐसे श्लोक हैं जो इस संदर्भ में आए हैं।