सत्य धर्म की पहचान

islamधर्मों की तुलना करते समय तीन ही वस्तुएं सम्भव होती हैं:

(1) या तो सभी सत्य हैं

(2) या सभी असत्य हैं

(3) अथवा एक सत्य शेष असत्य हैं।

और जब समस्त धर्म मौलिक नियमों में एक दूसरे से भिन्न हैं तो सभी सत्य नहीं हो सकते, और न ही सभी असत्य ही हो सकते हैं क्यों कि ऐसी स्थिति में यह प्रश्न पैदा होता है कि मानव जाति को उसके सृष्टा ने सत्य का ज्ञान प्रदान नहीं किया। इस लिए मानना पड़ेगा कि एक ही धर्म सत्य है जिसकी खोज समाज के रीति रेवाज और पक्षपात से दूर हो कर ही की जा सकती है।

सत्य धर्म वही हो सकता है जिसमें निम्नलिखित 10 विशेषताएं पाई जाती हों:

(1) उसमें एक ईश्वर की कल्पना बिल्कुल स्पष्ट हो और उसके मानने वाले मात्र उसी के सामने अपना माथा टेकते हों।

(2) ईश्वर का अवतरित किया हुआ नियम कब, कहां, कैसे, किन पर उतरा स्पष्ट हो और वह स्वयं सुरक्षित भी हो।

(3) वह नियम जीवन के प्रत्येग विभाल पर प्रकाश डातला हो अर्थात् एक सम्पूर्ण जीवन व्यवस्था देता हो।

(4) जीवन व्यवस्था को पेश करने के लिए विश्वसनीय लोगों की हर युग में एक टीम एकत्र रही हो जिन्हों ने अमानतदारी से उसे अपने बाद वालों तक पहुंचाया हो।

(5)  जिसने मात्र जीवन व्यवस्था ही प्रस्तुत न की हो अपितु उसके आधार पर एक शान्तिपूर्ण शासन स्थापित हुआ हो, और उसी व्यवस्था के आधार पर शासन के प्रत्येक नियम बने हों।

(6) जिसकी शिक्षाएं जातिवाद और भेद भाव से ऊपर उठ कर सारे मानव को एक माता पिता की संतान सिद्ध करती हों।

(7) जिसकी शिक्षाएं सन्यासी बनने से रोकतीं और समाज में रहने और पारिवारिक जीवन बिताने पर बल देती हों और इसे भी पुण्य का कार्य सिद्ध करती हों।

(8) जिसकी शिक्षाएं बिल्कुल Modern और Up to Date हों, जिसके किसी नियम में Expiry Date न पाया जाता हो। हर स्थान, हर युग और हर मानव के लिए बिल्कुल फिट हों।

(9) जिसकी शिक्षाओं में मानव जाति की आध्यात्मिक शुद्धता के साथ उनकी प्रत्येक सांसारिक समस्याओं का समाधान भी पाया जाता हो।

(10) जिसका संदेश एक विश्वव्यापी संदेश हो, विशेष स्थान, विशेष समुदाय, विशेष युग तक सीमित न हो अपितु सम्पूर्ण मानवता का मार्गदर्शन करता हो।         

जब अल्लाह ने सारे इनसानों को पैदा किया है तो उसमें से कुछ लोग बुरे कैसे हो गए ?

wheelchair-300x299एक सज्जन ने पूछा है कि जब अल्लाह ने सारे इनसानों को पैदा किया है तो उन में से कुछ लोग बुरे कैसे हो गए ?

इसका उत्तर यह है कि अल्लाह ने मानव को इस धरती पर परीक्षा हेतु पैदा किया और हर युग और हर देश में संदेष्टाओं द्वारा उनका मार्गदर्शन करता रहा कि तुम यदि एक अल्लाह के नियमानुसार जीवन बिताओगे तो सफलता पाओगे, परन्तु यदि उसके विरोध चलोगे तो नरक में जाओगे। लेकिन जब मानव ने अपने बीच संदेष्टाओं के हाथों पर चमत्कार उत्पन्न होते हुए  देखा तो किसी समूह ने उन्हें ईश्वर का बेटा मान लिया तो किसी ने उनको ईश्वर का रूप दे कर उन्हीं की पूजा शूरु कर दी।
अब क्या था … राक्षस को अवसर मिला मानव को पथभ्रष्ठ करने का … इस प्रकार वह  मानव को बुरे कर्मों में वयस्त करना शुरू कर दिया। मानव भी उनकी मानने लगा क्यों कि अल्लाह ने मानव को सही और ग़लत बताने के बाद अच्छा कर्म करने पर विवश नहीं किया था कि ऐसी परिस्थिति में परीक्षा अर्थहीन सिद्ध होता, इसी लिए उन्हें एखतियार दिया कि चाहे तो नरक में जाए, चाहे तो स्वर्ग में जाए, प्रश्नपत्र आउट है। इसी संदेश को बताने के लिए 124000 संदेष्टा भेजे गए, सब से अन्त में अल्लाह ने अपने अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल. को भेजा और उन पर क़ुरआन अवतरित किया, इनको सारे संसार के लिए भेजा और उनकी शिक्षाओं को प्रमाणित सिद्ध किया, इसी लिए आज ईश्वर तक पहुंचना है तो मात्र क़ुरआन ही हमें पहुंचा सकता है। क्यों कि यही एक सुरक्षित ग्रन्थ है जो हमारे सामने हमारे ईश्वर का सही संदेश परस्तुत करता है।
हमें आशा है कि इस तथ्य को जानने के पश्चात एकांत में इस्लाम के सम्बन्ध में चिंतन मनन करना शुरू करेंगे। हमारा काम संदेश पहुंचाना है मनवाना हमारा काम नहीं। धन्यवाद

इस्लाम जन-सेवा का आदेश देता है

helpinghandsइस्लाम में अल्लाह के अधिकार के तुरन्त बाद मानव के अधिकार के पालन का आदेश दिया गया है। क़ुरआन कहता हैः “नेकी और भलाई के काम में एक दूसरे की सहायता करो।” (अल-माईदा 2″)मुहम्मद सल्ल. की जीवनी का अध्ययन करें तो पाएंगे कि आप बाल्यावस्था से ही जनसेवा में ग्रस्त रहे, जब चालीस वर्ष की आयु में मुहम्मद सल्ल. पर हिरा की गुफा में प्रथन वह्य अवतरित हुई और चिंतित होकर अपनी पत्नी खदीजा रज़ि. के पास आए और उनसे पूरी घटना सुनाते हुए कहा कि मुझे अपनी जान का भय हो गया है। उस अवसर पर खदीज़ा ने साहस दिलाते हुए आपके जन सेवा को गिनाया कि अल्लाह आपको कदापि अपमानित न करेगा कि आप रिश्तेदारों का ख्याल रखते हैं, निर्धनों का बोझ उठाते हैं, मेहमानों का सत्कार करते हैं और कठिनाइयों के मारों का साथ देते हैं। मानो खदीजा यह कहना चाहती थीं कि जिस महान व्यक्ति के यह गुण हों वह अपमानित कैसे हो सकते हैं।आपने जन सेवा के महत्व को एक शब्दों में समेट दिया है कि “लोगों में सब से श्रेष्ठ वह व्यक्ति है जो लोगों के लिए अधिक लाभदायक हो।” (सहीह अल-जामिअ)
यहाँ तक कि आपने यह फरमा दिया कि:”जिस के पास अपनी आवश्यकता से अधिक सवारी है वह एहसान के तौर पर ऐसे व्यक्ति को दे दे जिसके पास सवारी नहीं है।” (मुस्लिम)
बात यहीं पर स्माप्त नहीं होती बल्कि इस्लाम ने जन सेवा पर विभिन्न प्रकार के पुण्य भी रखा इसी लिए अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमायाः “जो अपने भाई की ज़रूरत पूरी करने में लगा हो अल्लाह उसकी ज़रूरत पूरी करता है, जो कोई किसी मुसलमान की परेशानी को दूर करता है अल्लाह उस से क्यामत के दिन की कठिनाइयों में से बड़ी कठिनाई को दूर करेगा।” (बुखारी, मुस्लिम)
इस्लाम ने तो पशु पक्षियों पर भी एहसान करने पर सवाब रखा हैः अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमायाः “एक बार एक व्यक्ति रास्ते पर चला जा रहा था कि उसे सख्त प्यास लगी, उसने एक कुंवा पाया तो उसमें उतर कर उसने पानी पिया, फिर बाहर निकल आया तो देखा कि एक कुत्ता प्यास के मारे ज़बान बाहर निकले हांपते हुए कीचड़ चाट रहा है। उस व्यक्ति ने सोचा कि इस कुत्ते को भी उसी तरह प्यास लगी हुई है जिस तरह मुझे लगी थी। अतः वह दोबारा कुंवे में उतरा और अपना मोज़ा पानी से भरा और उसे अपने मुंह से पकड़े ऊपर चढ़ आया और कुत्ते को पानी पिलाया। अल्लाह ने उसके इस नेक काम के कारण उसके पापों को क्षमा कर दिया। (बुखारी, मुस्लिम)
एक सच्चे मुसलमान की यह पहचान है कि उसके द्वारा दूसरों को लाभ पहुंचे, उसका अस्तित्व मानवता के लिए लाभदायक हो. अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमाया: “अल्लाह के पास सबसे प्रिय व्यक्ति वह है जो लोगों को सबसे अधिक लाभ देने वाले हो अल्लाह के पास सबसे पसंदीदा प्रक्रिया यह है कि किसी मुसलमान के दिल में खुशी की लहर दौड़ा दो, या किसी की परेशानी दूर कर दो, या उसका कर्ज़ अदा कर दो, या उसकी भूख मिटा दो, मैं किसी मुसलमान की जरूरत पूरी करने के लिए चलूं, यह मेरे लिए मस्जिद (नबवी) में एक महीना एतकाफ में बैठने से बेहतर है “. (तबरानीःसहीह)
इसके विपरीप एक दूसरा परिणाम देखिए रसूल सल्ल. ने फरमाया कि एक महिला को एक बिल्ली के कारण अज़ाब दिया गया। उसने बिल्ली को बांध रखा था, उसे न खिलाती थी और न खोलती थी कि ज़मीन के कीड़े मकूड़े खा लेती, जिस से वह मर गई अतः इसके कारण वह नरक में गई। (बुखारी, मुस्लिम)
रास्ते से कष्टदायक वस्तु को हटा देना इस्लाम की दृष्टी में इतना बड़ा कार्य है कि सही मुस्लिम की रिवायक के अनुसार अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमायाः” मैं ने एक व्यक्ति को जन्नत में फिरते देखा ( उसके जन्नत में प्रवेश करने का कारण यह था कि) उसने वृक्ष अथवा उसकी टेहनी को काट दिया था जो रास्ते की बीच में थी और लोगों को इसके कारण कष्ट होता था। “

समाज में अमीरी और गरीबी क्यों ?

rich-man-poor-manअल्लाह ने रोज़ी का वितरण अपने हाथ में रखा है, कुछ लोगों को अधिक से अधिक दिया तो कुछ लोगों को कम से कम, हर युग में और हर समाज में मालदारा और गरीब दोनों का वजूद रहा है, सवाल यह है कि आखिर अल्लाह ने अमीरी और गरीबी की कल्पना क्यों रखी? 

इसका उत्तर यह है कि ऐसा अल्लाह ने बहुत बड़ी तत्वदर्शिता के अंतर्गत किया।  ताकि एक वर्ग दूसरे वर्ग के काम आ सके, प्रत्येक की आवश्यकताएं एक दूसरे से पूरी होती रहें। अल्लाह ने फरमायाः 

“और एक को दूसरे पर प्रधानता प्रदान किया ताकि तुम्हें आज़माए उन चीज़ों में जो तुम को दी है. (सूरः अनआन 165) 

 मान लें कि यदि सभी लोग मालदार हो जाते तो लोगों का जीवन बिताना कठिन होता, एक का काम दूसरे से हासिल नहीं हो सकता था, और हर एक दूसरे पर आगे बढ़ने की कोशिश करता,  इस प्रकार देश और समाज का विनाश होता. जबकि लोगों के स्तर में अंतर होने के कारण अल्लाह ने जिसे कम दिया है उसे कल महाप्रलय के दिन यदि वह ईमान वाला रहा तो वहां की नेमतों से मालामाल करने का वादा किया है। 

उसी प्रकार निर्धनों को कुछ ऐसी हार्दिक शान्ति प्रदान की है जिस से मालदारों का दामन खाली है।  इसके साथ साथ अल्लाह ने उनके प्रति लोगों के मन में दया-भाव, शुभचिंतन, सहानुभूति की भावना पैदा की, और मानव समाज का अंग सिद्ध किया ताकि धनवान उनका ख्याल करें, यही नहीं अपितु मालदारों को गरीबों पर खर्च करने का आदेश दिया, और उनके मालों में गरीबों का अधिकार ठहराया। अल्लाह तआला ने फरमायाः 

अल्लाह के माल में से तुम उन्हें (निर्धनों को) दो जो उसने तुम्हें दिया है। (कुरआनः सूरः नूरः 33)

पता यह चला कि इंसान के पास जो कुछ है उसका अपना नहीं है बल्कि अल्लाह का दिया हुआ है, इस लिए यदि मनुष्य कुछ पैसे अल्लाह के रास्ते में खर्च करता है तो उसे इस पर गर्व का कोई अधिकार नहीं है।
यह है अल्लाह की वह हिकमत जिस से हमें समाज में निर्धनों के वजूद के प्रति संतुष्टी प्राप्त होती है परन्तु यह कहना कि वह हीन अथवा तुच्छ हैं या उनके पापों का परिणाम है, या उनको किसी विशेष जाकि की सेवा हेतु पैदा किया गया है, बुद्धिसंगत बात नहीं लगती।
आज भारतीय समाज में यही विचार फैलने के कारण कुछ वर्ग पशुओं के समान जीवन बिता रहे हैं। उनको कोई अधिकार प्राप्त नहीं है और स्वयं उन्हों ने भी इस प्रथा को स्वीकार कर लिया है जो मावन जाति पर बहुत बड़ा अत्याचार है।
इस्लाम ऐसे वर्गों की हर प्रकार से सहायता करने का आदेश देते हुए मालदारों के मालों में उनका अधिकार रखता है और उनको निर्धन होने के कारण किसी भी मानवीय अधिकार से वंचित नहीं रखता। यह है  मानव स्वभाव से मेल खाने वाला इस्लाम का प्राकृतिक नियम…  

पूंजीवाद और समाजवाद की तुलना में ज़कात का इस्लामी नियम

 capitalismयदि कमाई का सारा अधिकार कमाने वाले से छीन लिया जाए तो मनुष्य के अंदर कोशिश करने की भावना नहीं रहती,खोज-परख की शक्ति बाकी नहीं रहती. और वह हर्ष व उल्लास नहीं रहता जो इंसान को अपनी कोशिश का नतीजा देख कर प्राप्त होता है. अगर यह भावना मनुष्य से छीन ली जाए तो इंसान के अंदर अपने माल को विकसित करने की भावना नहीं रहेगी, उसके जीवन का जोश और उत्साह ठंडा पड़ जाएगा. यही दृष्टिकोण पैदा हुआ था रूस में समाजवाद के नाम से कि उत्पादन जनता की संयुक्त संपत्ति है, जिसमें सब को बराबर का हिस्सा मिलेगा, कमाई किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होगी …. फिर क्या हुआ?  

कुछ वर्षों के बाद यह व्यवस्था स्वयं अपनी मौत मर गई और संसार में उसका नाम व निशान भी न रहा। इस प्रणाली की तुलना में एक और प्रणाली आयी जिसका नाम दुनिया ने पूंजीवाद रखा, इस प्रणाली ने व्यक्ति को उत्पादन का ऐसा मालिक बना दिया जिस में दोसरों का कण बराबर भी अधिकार नहीं रखा गया. यही वह प्रणाली है जो पूरी दुनिया में आज प्रचलित है, इस प्रणाली के कारण कुछ लोगों की मुट्ठी में दुनिया की दौलत घूम रही है, लोग वैध और अवैध की परवाह किए बिना पैसे इकट्ठा कर रहे हैं, यहाँ एक वर्ग मालदार से मालदार तर होता जा रहा है तो दुसरा वर्ग गरीब से गरीब तर होता जा रहा है. इसलिए आज दनिया इस प्रणाली से थक चुकी है और इसके विरोध  दुनिया के कोने कोने में प्रति दिन विरोध हो रहा है।
इन दोनों के बीच इस्लाम ने जो तीसरी प्रणाली दी वह अति उचित प्रणाली है कि न तो एक व्यक्ति की कमाई को सरकार की संपत्ति ठहराया कि सब को उसमें समान अधिकार मिले न मनुष्य को अपनी कमाई पर यूं सांप बना कर बैठा दिया कि उसमें किसी अन्य का कोई अधिकार ही न हो। इस्लाम ने प्राकृतिक व्यवस्था यह दिया कि इंसान अपनी मेहनत से जो कुछ कमाता है वह उसी की संपत्ति है लेकिन उसके माल में समाज के गरीबों और निर्धनों का भी अधिकार है। यदि उसकी सम्पत्ति इस्लाम की निर्धारित मात्रा को पहुंच रही है तो नमाज़ रोज़े के समान उस पर जरूरी है कि अपने माल से एक साधारण मात्रा में गरीबों के लिए निकाले …. इसी को इस्लाम की शब्दावली में ज़कात कहा जाता है।

इस्लाम मानव के बीच से भेदभाव को मिटाता है

 359xnv9 इस्लाम रंग नस्ल और जाति के अंतर को मिटाकर सारी मानवता को एक कर देता है। सारे इनसनों को एक माँ बाप की संतान ठहराता है,जिनके बीच कोई भेदभाव,जातीय पक्षपात और उच्च्यता नहींइस प्रकार इस्लाम विश्व भाईचारा स्थापित करता हैः 

“ऐ लोगो! हमने तुम सब को एक ही पुरुष एवं स्त्रि से पैदा किया तथा कबीलों और समुदायों में बांट दिया ताकि एक दूसरे को पहचान सको, अल्लाह के निकट तुम में उत्तम वह है जो अल्लाह का सबसे अधिक डर रखने वाला हो।” (सूरः हुजरात 13)

 अन्तिम हज्ज के अवसर पर मुहम्मद सल्ल0 ने अपने एक लाख 44 हज़ार अनुयाइयों के समूह को सम्बोधित करते हुए यही बात कही थीः

” किसी अरबी को किसी अजमी पर, और किसी अजमी को किसी अरबी पर , किसी गोरे को किसी काले पर और किसी काले को किसी गोरे पर कोई श्रेष्टता नहीं। श्रेष्टता का आधार अल्लाह का संयम है। (मुस्नद अहमद) 

इसी लिए इस्लाम में दुनिया के किसी कोने के लोग जब प्रवेश करते हैं तो यहाँ पर समान स्थान प्राप्त करते हैं उसके बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं रखा जाता कि सारे मानव आदम की संतान हैं।

इस्लाम हमें अपने निर्माता और मालक से मिलाता है

 safe_image इस्लाम हमें उस ईश्वर और अल्लाह से मिलाता है जो अकेला हैउस का कोई साझीदार नहींवह अद्वितीय हैअनादी हैअनन्त है और अविनाशी हैउसी ने इस पूरी सृष्टि की रचना कीवह किसी काम के लिए किसी का मुहताज नहीं हैप्रकृती और जीव भी अपने आप नहीं हैंउनको भी अल्लाह ही ने उत्पन्न किया है। उसी की आज्ञानुसार सब कुछ होता है । वह न खाता हैन पिता हैऔर न सोता है। वही रोगी को अच्छा करता हैवही तकलीफों को दूर करता है । वह किसी का मुह़ताज नहीं और न उसे किसी चीज़ की ज़रुरत । वही अकेला इबादत और प्रार्थाना का अधिकारी हैबाक़ी सब उसके पुजारी और उपासक हैं,चाहे वह कैसा ही गुणवान हो ।वह पिता पुत्र पति पत्नी जैसे संम्बन्धों से मुक्त हैउसी प्रकार वह किसी भी प्राणी का रुप धारण नहीं करतान वह किसी कार्य के लिए शरीर धारण करने पर बाध्य है । उसने केवल अपनी इच्छा शक्ति से इतने बढे सृष्टि की रचना कर दी तो किसी कार्य के लिए उसको शरीर धारण करने की क्या आवश्यकतायह उसकी पवित्रता के विरुद्ध है । इस्लाम हमारे माथे का सम्मान करता है कि उसे केवल अल्लाह के सामने ही झुकना चाहिए जिसने हमें, हमारे पूर्वजों को और संसार के प्रत्येक जीव को पैदा किया, हम पर हर प्रकार के उपकार किए तो स्वाभाविक रूप में पूजा भी तो उसी एक अल्लाह की होनी चाहिए। क़ुरआन कहता हैः

ऐ लोगो! अपने उस पालनहार की इबादत करो जिसने तुम को और तुम से पहले के लोगों को पैदा किया ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ। जिसने तुम्हारे लिए धरती को बिछावन और आकाश को छत बनाया, और आकाश से वर्षा की और उस से फल पैदा कर के तुम्हें जीविका प्रदान की। अतः यह जानते हुए किसी को अल्लाह का भागीदार न बनाओ।”  (सूरः2 आयत 21-22)  

इस्लाम एक जीवन व्यवस्था है

 Coral_Way_20100321 (1)इस्लाम जीवन बिताने की एक प्रणाली हैजीवन के हर भाग में मार्गदर्शन करता है। इस में किसी प्रकार की कमी औऱ ज़्यादती की कोई गुंजाइश नहीं। कुरआन कहता हैः “आज मैंने तुम्हारा धर्म पूरा कर दिया तुम पर अपनी नेमत पूर्ण कर दी, और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के रूप में पसंद कर किया। (सूरःअल-माइदा 3) यह धर्म इतना ही पुराना है जितना कि स्वयं मनुष्य है। इस्लाम प्रत्येक मनुष्यों का धर्म है जो पहले व्यक्ति आदम अलैहिस्सलाम से शुरू हुआहर युग में संदेष्टा आते रहेलेकिन जब दुनिया सातवीं शताब्दी ईसवी में अपनी जवानी को पहुँच गई तब अल्लाह ने अन्तिम नबी मुहम्मद सल्ल. को विश्व नायक बनाकर भेजा और आपके लाए हुए जीवन व्यवस्था को महाप्रलय के दिन तक के लिए पूर्ण रूप में सुरक्षित कर दिया।

 
जब अपनी पूरी जवानी पे आ गई दुनिया
जहां के वास्ते एक आख़िरी प्याम आया
 
इस्लाम की सार्वभौमिकता जीवन के विभिन्न भागों में है। यह जीवन के आध्यात्मिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, नैतिक तात्पर्य यह कि प्रत्येक भागों में हमारा मार्गदर्शन करता है। समय का समावेश देखें कि इस्लाम हर युग के लिए आया, जगह का समावेश देखें कि इस्लाम का संदेश सारी पृथ्वी को शामिल है। व्यक्तियों का समावेश देखें कि यह सभी व्यक्तियों, सभी जातियों और सभी उम्र के लोगों के लिए है। इस्लामी कानून का समावेश देखें कि यह धर्म और जाति का फर्क़ किए बिना प्रत्येक लोगों के बीच न्याय का मआमला करता है। हर धर्म के मानने वालों को अपने धर्म के पालन की पूरी स्वतंत्रता देता है। अतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध का आदेश देता है , मानव जीवन को संतुलित करने की कोशिश करता है। समय की बहुमूल्यता की ओर ध्यान दिलाता है। ज्ञान में वृधि लाने का आदेश देता है। हलाह माध्यम से माल बढ़ाने पर उभारता और इसके लिए अवैध तरीक़ा अपनाने से रोकता है। इसकी पाबंदी से समाज और देश में शान्ति का वातावरण तो बनता ही है स्वयं व्यक्तिगत जीवन भी शान्ति से परिपूर्ण हो जाता है।

इस्लाम एक विश्वव्यापी धर्म है

Allah-glob 

इस्लाम की शिक्षा किसी विशेष स्थान, किसी राष्ट्र, या किसी विशेष समय के लिए नहीं है बल्कि यह पूरी मानवता का धर्म है जो महाप्रलय के दिन तक दुनिया का मार्गदर्शन करता रहेगा। कुरआन स्वयं अपना परिचय कराता हैः “निःसंदेह यह कुरआन मार्गदर्शन है सारी मानवता के लिए।”  (सूरः तक्वीर 27) एक अन्य स्थान पर फरमायाः “महिमावान है वह अल्लाह जिसने अपने बन्दे पर कुरआन उतारा ताकि वह सारी दुनिया के लिए डराने वाला हो।” (सूरः फुरक़ान 1) क़ुरआन अन्तिम नबी मुहम्मद सल्ल. के सम्बन्ध में कहता है “हमने आपको सारे इंसानों के लिए सुसमाचार देने वाला और डराने वाला बनाकर भेजा है। लेकिन अधिकांश लोग इसे नहीं जानते.” (सबा 28)
जी हाँ! यदि वह जानते तो अवश्य आपके संदेश को स्वीकार कर लेते लेकिन वह जानते नहीं हैं जिसके कारण इस संदेश को मुसलमानों का धर्म मान रखा है। 

राष्ट्र से प्रेम और इस्लाम

अपनी मातृभूमि से प्रेम, स्नह और मुहब्बत एक ऐसी प्राकृतिक भावना है जो हर इंसान बल्कि हर ज़ीव में पाई जाती है। जिस धरती पर मनुष्य पैदा होता है, अपने जीवन के रात और दिन बिताता है, जहां उसके रिश्तेदार सम्बन्धी होते हैं,वह धरती उसका अपना घर कहलाती है, वहाँ की गलयों, वहाँ के दरो-दीवार, वहां के पहाड़,घाटियां, चट्टानें,जल और हवाएं नदी नाले, खेत खलयान तात्पर्य यह कि वहां की एक एक चीज़ से उसकी यादें जुड़ी होती हैं। जहां उसक दोस्तों, माता पिता, दादा दादी का प्यार पाया जाता है। प्रवासी होने के नाते हमें इसका सही अनुभव है। किसी को यदि भारत के किसी कोने में कमाने के लिए जाना होता है तो उसका इतना दिल नहीं फटता जितना एक प्रवासी का फटता है जब वह विदेश जा रहा होता है। यह एक प्राकृतिक भावना है, इसी लिए जो लोग देश से विश्वासघात करते हैं उन्हें कभी अच्छे शब्दों से याद नहीं किया जाता बल्कि दिल में उनके खिलाफ हमेशा नफरत की भावनाएं पैदा होती हैं। उसके विपरीत जो लोग देश के लिए बलिदान देते हैं उसके जाने के बाद भी लोगों के हृदय में वह जीवित होते हैं। 

मातृभूमि से प्रेम की इस प्राकृतिक भावना का इस्लाम न केवल सम्मान करता है अपितु ऐसा शान्तिपूण वातावरण प्रदान करता है जिस में रह कर मानव अपनी मातृभूमि की भलीभांति सेवा कर सके। 
 “हे मक्का तू कितनी पवित्र धरती है… कितनी प्यारी है मेरी दृष्टि में….यदि मेरे समुदाय ने मुझे यहां से न निकाला होता तो मैं कदापि किसी अन्य स्थान की ओर प्रस्थान कदापि न करता।”  (तिर्मिज़ी)
यह वाक्य उस महान व्यक्ति की पवित्र ज़बान से निकला हुआ है जिन्हें हम मुहम्मद सल्ल. कहते है। और उस सयम निकला था जबकि अपनी मातृभूमि से उन्हें निकाला जा रहा था। मुहम्मद सल्ल. मक्का से न निकलते अगर निकाला न जाता, आपने हर प्रकार की यातनाएं झेलीं पर अपनी मातृभूमि में रहना पसंद किया। परन्तु जब पानी सर से ऊंचा हो गया तो न चाहते हुए भी मक्का से निकलने के लिए तैयार हो गए, जब वहाँ से प्रस्थान कर रहे थे तो विदाई के समय दिल पर उदासी छाई हुई थी। और ज़बान पर उपर्युक्त वाक्य जारी था। जब मदीना आए तो मदीना में ठहरने के बाद मदीना के लिए इन शब्दों में प्रार्थना कीः
”  हे अल्लाह हमारे दिल में मदीना से वैसे ही प्रेम डाल दे जैसे मक्का से है बल्कि उस से भी अधिक। “(बुख़ारी, मुस्लिम)
मातृभूमि से प्रेम केवल भावनाओं तक सीमित नहीं होता अपितु हमारी कथनी और करनी में भी आ जाना चाहिए इस में सब से पहले अपनी मातृभूमि की शान्ति और सलामती के लिए अल्लाह से दुआ करनी चाहिए क्योंकि दुआ में दिल की सच्चाई का प्रदर्शन होता है। इस में  झूठ, अतिशयोक्ति, या पाखंड नहीं होता और अल्लाह के साथ सीधा संबंध होता हैः
अल्लाह के रसूल ने मदीना के लिए दुआ कीः हे अल्लाह मक्का से मदीना में दो गुनी बर्कत प्रदान कर। (बुखारी, मुस्लिम)
मक्का के सम्बन्ध में स्वयं इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने प्रार्थना की थी कि हे अल्लाह इस धरती को शान्ति केन्द्र बना और भोजन हेतु यहाँ के निवासियों को विभिन्न प्रकार के फल प्रदान कर। (अल-बकरः 126)
ईब्राहीम अलै0 ने मक्का में अम्न और रिज़्क़ में वृद्धि के लिए दुआ की जो जीवन सामग्रियों में महत्वपूर्ण भुमिका अदा करता है। यदि वह दोनों या उनमें से एक खो जाए तो शान्ति भंग जाती है।
इस्लाम ने देश की शान्ति को भंग करने वालों के लिए सख्त से सख्त सज़ा सुनाई है मात्र इस लिए कि किसी को राष्ट्र में अशान्ति फैलाने का साहस न हो सकेः क़ुरआन ने कहाः जो लोग धरती में फसाद मचाते हैं (अर्थात् आतंक, बलात्कार, हत्या आदि) उनकी सज़ा यह है कि उनकी हत्या कर दी जाए, या उनको फ़ांसी पर लटका दिया जाए या उनका दायां हाथ और बायां पैर या बायां हाथ और दायां पैर काट दिया जाए, अथवा उन्हें देश निकाला दे दिया जाए।(माइदा 33)
देशवासियों में प्रेम और इस्लामः इस्लाम हर उस काम का आदेश देता है जिस से राष्ट्र के लोगों के बीच सम्बन्ध मजबूत रहे। इस्लाम ने मातृभूमि से प्यार के अंतर्गत ही रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है। इसे बहुत बड़ी नेकी बताया गया है और उसे नष्ट करना फसाद का कारण सिद्ध किया है। सम्बन्ध बनाने की सीमा इतनी विशाल है कि हर व्यक्ति के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश दिया गया। इसी लिए मुहम्मद सल्ल. ने फरमायाः तुम में का एक व्यक्ति उस समय तक मोमिन नहीं हो सकता जब तक अपने भाई के लिए वही न पसंद करे जो अपने लिए पसंद करता हैं। बल्कि इस्लाम ने विश्व बंधुत्व की कल्पना देते हुए सारे मानव को एक ही माता पिता की संतान सिद्ध किया और उनके बीच हर प्रकार के भेद भाव का खंडन करते हुए फरमाया कि ईश्वर के निकट सब से बड़ा व्यक्ति वह है जो अल्लाह का सब से अधिक भय रखने वाला हो। इसी लिए मुहम्मद सल्ल. ने आदेश दिया कि
” जिस किसी ने किसी अम्न से रहने वाले गैर-मुस्लिम पर अत्याचार किया, या उसके अधिकार में किसी प्रकार की कमी की, या उसकी शक्ति से अधिक उस पर काम का बोझ डाला, या उसकी इच्छा के बिना उसकी कोई चीज़ ले ली तो में कल क्यामक के दिन उसका विरोधी हुंगा।
बल्कि इस्लाम ने पशु पक्षी, पौधे, और पत्थर सब के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश दियाः आपने ने फरमाया कि यदि क़यामत होने होने को हो और तुम्हारे हाथ में पैधा हो तो उसे लगो दो कि इसमें भी पुण्य है।
स्वतंत्रता अभियान और मुसलमानः भारत का इतिहास साक्षी है कि जब तन के गोरे और मन के काले भारत में कारोबार के नाम पर आए तो सर्वप्रथन इस्लामी विद्वानों ने अंग्रेज़ों के विरोद्ध में युद्ध करने की घोषणा की थी। सब से पहले शाह अब्दुल अज़ीज़ दिहलवी ने अंग्रेज़ों से युद्ध का फतवा दिया और फिर इस सोच को भारत के कोने कोने में फैलाया, 1857 से पहले मुसलमान ही इस अभियान में शरीक थे, बाद में मुस्लिम विद्वानों ने ग़ैरमुस्लिम भाइयों तक भी अपनी भावनाएं पहुंचाईं यहां तक कि स्वतंत्रता का अभियान देश के कोने कोने में चलने लगा। अंततः 1947 में हमारा भारत स्वतंत्र हो गा। मुसलमानों ने अपने देश की स्वतंत्रता के लिए जो बलिदान दिया है वह भारत के इतिहास का एक रौशन बाब है।
चप्पा चप्पा बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने हैं।
आज भी हमें अपने देश से प्रेम है और उसके लिए हम कट मरने तब की भावना रखते हैं। परन्तु भारत में साम्प्रदाइकता का बुरा हो कि आज़ादी के बाद ही कुछ लोग ऐसे पैदा हुए जिन्होंने अंग्रेज़ों की पालीसी “फूट डोलो हुकूमत करो” को अपनाते हुए देश में घृणा फैलाने की कोशिश की। मुसलमानों को हमेशा देश में सौतेला सिद्ध करने का प्रयास करते रहे।
हम देश प्रेमी हैं देश भक्त नहीः कुछ सज्जन पूछेंते हैं कि आप अपने धर्देम को पहले मानते हैं या अपने देश को… ऐसे लोगों से हम कहना चाहेंगे कि आप हमसे मानो यह पूछ रहे हैं कि तुम अपने बाप का बेटा हो या मां का। इसका उत्तर यह है कि मैं अपने बाप का भी बेटा हूं और मां का भी। मुसलमान होने के नाते मेरा धर्म इस्लाम है और भारती होने के नाते मेरा देश भारत है.. इस लिए किसी के देश प्रेमी होने पर संदेह करना स्वयं को देश द्रोंही सिद्ध करना है। हम अपने देश से इतना प्यार करते हैं कि उसके लिए जान देने के लिए भी तैयार हैं परन्तु इसके बावजूद हम देश प्रेमी ही रहेंगे देश भक्त नहीं हो सकते। क्यों कि भक्ति मात्र एक अल्लाह की होनी चाहिए। भक्ति में उसके साथ अन्य को भागीदार ठहराना वैध नहीं। जिसका राज है उसी का चलना चाहिए, जिस कम्पनी के कर्मचारी हैं उसी का काम करना चाहिए। यह धरती ईश्वर की है इस लिए धरती की पूजा नहीं अपितु धरती के बनाने वाले ईश्वर( अल्लाह) की पूजा होनी चाहिए।
राष्ट्र से प्रेम करने वाला कौनः राष्ट्र से प्रेम करने वाला वही हो सकता है जो राष्ट्र हित के लिए काम करे, जो प्रेम और स्नेह का वातावरण बनाए, जो बंधुत्व और भाईचारा को बढ़ावा दे। वह देश प्रेमी नहीं हो सकता जो देश की शान्ति को भंग करे, जो देश की एकता का विरोद्ध करे, जो देश में घृणा फैलाए, जो देश की सम्पत्ति का दुर्उपयोग करे।
राष्ट्र के प्रति हमारा कर्तव्यः 63वें गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर हमें अपना जाइज़ा लेने की ज़रूरत है कि हमने अब तक अपने देश के लिए क्या क्या है। देश की प्रगति में कितना भाग लिया है। जन-कल्याण के लिए क्या क्या है। जाग्रुकता अभियान में किस हद तक भाग लिया है। आज हमारा कर्तव्य बनता है कि भारत की प्रगति हेतु शिक्षा और जन-कल्याण के लिए जो भी भुमिकाएं हो सकती हों अदा करने का वचन दें।