आवश्यकता से अधिक जल रोक लेना सही नहीं।

December 15th, 2011 by safat alam taimi

water lust why all the ex 1 आवश्यकता से अधिक जल रोक लेना सही नहीं।आवश्यकता से अधिक जल रोक लेना सही नहीं क्योकि जल ही जीवन है और यह यह बात याद रखें कि संसार के रचयिता ने मानव लाभ हेतु संसार में विभिन्न प्रकार की सामग्रियाँ पैदा की हैं जिन से मानव लाभांवित होता है। उनमें में से कुछ पर मानव अपना अधिकार रखता है तो कुछ सार्वजनिक रूप में सब के प्रयोग के लिए हैं जैसे चन्द्रमा, सूर्य, हवा और जल आदि।

मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों में ऐसे विभिन्न आदेश मिलते हैं जिन से ज्ञात होता है कि आवश्यकता से अधिक पानी रोक लेना सही नहीं। उदाहरण-स्वरूप हम कुछ प्रवचन पेश करते हैं:

(1) मुहम्मद सल्ल0 ने आवश्यकता से अधिक पानी रोक लेने से मना किया। ( मुस्लिम)

(2)   ” आवश्यकता से अधिक पानी रोका नहीं जा सकता कि इस से हरयाली को हानि पहुंचती है।” (बुखारी, मुस्लिम)

(2) ” जिसने आवश्यकता से अधिक पानी अथवा हरयाली रोक ली अल्लाह कल क्यामत के दिन उसका रिज्क रोक देगा। ” ( मुस्नद अहमद)

पानी को ईश्वर ने मानव और पशु पक्षि सब के लिए समान रूप में पैदा किया है और उन सब की सैराबी का उसे माध्यम बनाया है। इस लिए यदि पानी सार्वजिक स्थान पर हो तो किसी के लिए उसे रोक लेना सही नही। हाँ यदि कोई पानी उठा कर ले जाता है तो वह उस पर अधिकार अवश्य रखता है परन्तु अगर आवश्यकता से ज्यादा है तो उसके लिए इसे भी रोक लेना सही नहीं।

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आत्म-हत्या की बढ़ती हुई मानसिकता और उसका समाधान

December 15th, 2011 by safat alam taimi

2 आत्म हत्या की बढ़ती हुई मानसिकता और उसका समाधानइस समय दुर्भाग्य से पूरी दुनिया में आत्म-हत्या का रुजहान बढ़ता जा रहा है। पश्चिमी देशों में सामाजिक व्यवस्था के बिखराव के कारण समय से आत्म-हत्या की बीमारी प्रचलिम है। भारत सरकार की तत्कालिन रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर एक घंटे में आत्म-हत्या की पंद्रह घटनाएं पेश आती हैं। खेद की बात यह है कि आत्म-हत्या की इन घटनाओं में एक अच्छी खासी संख्या पढ़े लिखे और उच्च शिक्षित युवकों की है । सप्ताह में चार पाँच दिन दैनिक अख़बारों में ऐसी ख़बरें मिल ही जाती हैं जिनमें महिलाओं की आत्म-हत्या का वर्णन होता है, यह घटनायें सामान्य रूप में ससुराल वालों के अत्याचार और पैसों के न खत्म होने वाली मांगों के कारण पेश आती हैं। ऐसे मां बाप की मौत भी अनोखी बात नहीं रही जो अपनी गरीबी के कारण अपनी बेटियों के हाथ पीले करने में असमर्थ हैं और ज़ालिम समाज ने उन्हें सख्त मानसिक तनाव में ग्रस्त किया हुआ है।
इसका कारण क्या है? और इसका समाधान कैसे सम्भव हो सकता है? आइए इस्लामी दृष्टिकोण से इस विषय पर विचार करते हैं:
मनुष्य पर अनिवार्य है कि वह संभवतः अपनी जान की सुरक्षा करे, क्योंकि जीवन उसके पास ईश्वर (अल्लाह) की अमानत है और अमानत की सुरक्षा करना हमारा नैतिक और मानवीय दायित्व है। इसलिए इस्लाम की निगाह में आत्म-हत्या बहुत बड़ा पाप और गंभीर अपराध है। ऐसा पाप जो उसे दुनिया से भी वंचित करता है और परलोक से भी । खुद कुरआन ने आत्म-हत्या से मना फ़रमाया हैः अल्लाह (ईश्वर) का आदेश है:”अपने आप को क़त्ल मत करो”( सूरः अन्निसा: 29) और अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 के विभिन्य प्रवचनों में आत्म-हत्या का खंडन किया गया और बहुत सख्ती और बल के साथ आत्म-हत्या से मना किया गया है। आपने फरमायाः “जिसने अपने आप को पहाड़ से गिरा कर आत्म-हत्या की वह नरक की आग में भी इसी तरह हमेशा गिरता रहेगा और जिस व्यक्ति ने लोहे की हथियार से खुद को मारा वह नरक में भी हमेशा अपने पेट में हथियार घोंपता रहेगा।”(बुखारी)
एक दूसरे स्थान पर आपका आदेश हैः”गला घोंट कर आत्महत्या करने वाला नरक में हमेशा गला घोंटता रहेगा और अपने आप को भाला मार कर हत्या करने वाला नरक में भी हमेशा अपने आप को भाला मारता रहेगा।” (बुखारी)
क़ुरआन और मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों से अनुमान किया जा सकता है कि आत्म-हत्या इस्लाम की निगाह में कितना गंभीर अपराध है। यह वास्तव में जीवन की समस्याओं और मुश्किलों से भागने का रास्ता अपनाना है और अपनी ज़िम्मेदारियों से भाग निकलने का एक अवैध और अमानवीय उपाय है।
जो व्यक्ति अल्लाह पर विश्वास रखता हो, वह दृढ़ विश्वास रखता हो कि ख़ुदा समस्याओं की काली रात से आसानी और उम्मीद की नई सुबह पैदा कर सकता है, जो व्यक्ति भाग्य में विश्वास रखता हो कि खुशहाली और तंगी संकट और तकलीफ़ अल्लाह ही की ओर से है । धैर्य और संतोष मनुष्य का कर्तव्य है और जो परलोक में विश्वास रखता हो कि जीवन की परेशानियों से थके हुए यात्रियों के लिए वहाँ राहत और आराम है। ऐसा व्यक्ति कभी आत्म-हत्या की मानसिकता नहीं बना सकता।
आज आवश्यकचा इस बात की है कि आत्म-हत्या के नैतिक और सामाजिक नुकसान लोगों को बताए जाएं। समाज के निर्धनों और मकज़ोरों के साथ नरमी और सहयोग का व्यवहार किया जाए। घर और परिवार में प्रेम का वातावरण स्थापित किया जाए। बाहर से आने वाली बहू को प्यार का उपहार दिया जाए, रिती रिवाज की जिन जंजीरों ने समाज को घायल किया है, उन्हें काट फेंका जाए। शादी, विवाह के कामों को सरल बनाए जाएं और जो लोग मानसिक तनाव में ग्रस्त हों और समस्याओं में घिरे हुए हों उनमें जीने और समस्याओं और संकट से मुक़ाबला करने की साहस पैदा की जाए।

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हर बात को आप धार्मिक चश्में से क्यों देखते हैं ?

December 15th, 2011 by safat alam taimi

world map हर बात को आप धार्मिक चश्में से क्यों देखते हैं ?कुछ सज्जन यह कहते हैं कि आखिर कुछ लोग हर बात एवं घटना को धार्मिक चश्मे से देख कर उसे धार्मिक
रंग में क्यों रंग देते हैं।” इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म एक व्यक्तिगत मआमला है, इसे सार्वजनिक रूप नहीं देना चाहिए, परन्तु मैं एक मुस्लिम की हैसियत से इस बात से सहमत नहीं, मैं एक धार्मिक व्यक्ति हूं। और धर्म एक इनसान की प्रकृति में शामिल है। हम सब का पैदा करने वाला ईश्वर जो एक है जिसके समान कोई नहीं, न उसका कोई भागीदार है, न उसे मानव रूप धारण करके पृथ्वी पर अवतरित होने की आवश्यकता पड़ती है। हाँ ! यह सत्य है कि उसने मानव की रचना करने के बाद उसे यूं ही छोड़ नहीं दिया कि जैसे चाहे अपनी इच्छानुसार जीवन बिताए अपितु मानव में से ही क्रान्तिकारी मनुष्यों को चयन कर के उनका मार्गदर्शन किया, जिनको अवतार अथवा संदेष्टा कहते हैं, वह हर युग और हर देश में आते रहे, जिनकी संख्या एक लाख तक पहुंचती है। उनको अपने अपने देश तथा समाज हेतु भेजा जाता था।
परन्तु जब सातवीं शताब्दि ईसवी में यातायात के साधन ठीक हो गए। तथा एक देश का दूसरे देश से सम्पर्क होने लगा तो सम्पूर्ण संसार हेतु अन्तिम अवतार भेजे गए जिन पर क़ुरआन का अवतरण हुआ जो सारे मानव को सम्बोधित करता हैं। उन्हें हम मुहम्मद कहते हैं। कुरआन लोगों को विभिन्न जातियों में विभाजित नहीं करता अपितु एकत्र करता है। उसका सार मात्र एक ईश्वर की पूजा और मानव भाई चारा है। क़ुरआन के अनुसार सारे मानव की उत्पत्ति एक ही मानव आदम औऱ हव्वा से हुई है और उन सब का बनाने वाला भी एक ही है। इस प्रकार इस्लाम मानव का धर्म है परन्तु खेद की बात यह है कि अधिक लोग अपने ही परम धर्म से वंचित हो कर इधर उधर भटक रहे हैं। आज ईश्वर का नाम तो सब लेते हैं परन्तु उसे पहचानते बहुत कम लोग हैं।
यह भी सत्य है कि हम सब एक दिन अपने पैदा करने वाले के पास पहुँचने वाले और इस जीवन का लेखा जोखा देने वाले हैं, जिसके आधार पर ही हमारे स्वर्ग अथवा नरक का निर्णय किया जाएगा।
यदि हमें इन बातों का ज्ञान है जो सब को सत्य की ओर अग्रसर कर सकती हैं, और हम इन्हें छुपाएं अथवा बयान करने से संकोच करें तो मैं अपने भाईयों का शुभ-चिंतक नहीं बन सकता।

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क्या इस्लाम काफिरों को मारने का आदेश देता है ?

December 8th, 2011 by safat alam taimi

peace dove med res क्या इस्लाम काफिरों को मारने का आदेश देता है ?कुछ सज्जन कुरआन में युद्ध की आयतों को पढ़ कर यह परिणाम निकालते हैं कि कुरआन हिंसा की ओर बोलाता है। उदाहरणस्वरूप क़ुरआन में कुछ स्थानों पर इस प्रकार की बातें कही गई हैं कि काफिरों को जहाँ पाओ उन्हें क़त्ल कर दो….. ज़ाहिर है कि जिस धर्म का अर्थ ही शान्ति होता हैं। और जिस धर्म नें किसी गैर मुस्लिम की अकारण हत्या को सम्पूर्ण मानव की हत्या सिद्ध की है (सूरः माइदा आयत 32) और जिस धर्म के अन्तिम सन्देष्टा की शिक्षा है कि ” जो व्यक्ति इस्लामी देश में रहने वाले किसी गैर मुस्लिम की अकारण हत्या कर देता है वह स्वर्ग की हवा तक न पाएगा ” ( बुखारी हदीस न0 3166) उस धर्म के ग्रन्थ में ऐसी आयतों का पाया जाना अलग ही अर्थ रखता होगा…. अब प्रश्न यह है कि इसका क्या अर्थ हो सकता है ? यह बात नोट करें कि इन आयतों का सम्बन्ध सामान्य स्थिति से नहीं है अपितु उनमें युद्धस्तर के सम्बन्ध में आदेश दिया गया है। युद्ध की स्थिति में कोई भी पक्ष दूसरे पक्ष की रिआयत नहीं करता। हिन्दू धर्मिक ग्रन्थों में सैकरों ऐसे श्लोक हैं जो इस संदर्भ में आए हैं।

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गणेश जी फिर चर्चा में

December 8th, 2011 by safat alam taimi
  श्रीगंगानगर- कौन जाने किसने किसको पहला फोन करके या मौखिक ये कहा, गणेश जी की मूर्ति के सामने घी का दीपक जला कर तीन मन्नत मांगो पूरी हो जाएगी। उसके बाद तीन अन्य लोगों को ऐसा करने के लिए कहो। बस उसके बाद शुरू हो गया घर घर में गणेश जी के सामने दीपक जलाने,मन्नत मांगने और आगे इस बात को बताने का काम। …. 1994 के आसपास गणेश जी को दूध पिलाने की बात हुई थी। देखते ही देखते मंदिरों में लोगों की भीड़ लग गई थी। लोग अपना जरूरी काम काज छोडकर गणेश जी को दूध पिलाने में लगे थे।
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हर समय गुंजने वाली आवाज़

December 8th, 2011 by safat alam taimi
 azan हर समय गुंजने वाली आवाज़
एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार संसार में हर समय गुंजने वाली आवाज़ अज़ान है। इंडोनेशिया से फज्र का समय आरंभ होकर सुमात्रा तक आ जाता है। यह सिलसिला मलाया,ढ़ाका और पूरे भारत के बाद पाकिस्तान में शुरू हो जाता है। उसके बाद अफ्गानिस्तान, मस्क़त,सऊदी अरब, यमन, इराक़ में अज़ान शुरू हो जाती है। फिर मिस्र, इस्तैंबूल, ट्राइपोलि, लीबिया, नॉर्थ अमेरिका में अज़ान का समय हो जाता है। और ऐसे ही फज्र की अज़ान 9 घंटे का सफर तै करती है तो इंडोनेशिया में ज़ुहर का समय हो जाता है। इस प्रकार पाँच समय की अज़ान से संसार में एक भी ऐसा सिकण्ड नहीं जब अज़ान की आवाज़ न गूंज रही हो।
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मुहम्मद सल्ल0 के मदीना हिजरत से प्राप्त होने वाले पाठ

December 8th, 2011 by safat alam taimi

7 300x199 मुहम्मद सल्ल0 के मदीना हिजरत से प्राप्त होने वाले पाठ(1)      धैर्य और विश्वास सहायता और विजय का रास्ता हैः मुहम्मद सल्ल0 और आपके साथियों ने 13 वर्ष तक मक्का में अत्याचार सहन कर चुके तो अल्लाह की चाहत हुई कि परिणाम-स्वरूप उन पर सहायता और विजय के द्वार खोल दे।

(2)      अल्लाह पर विश्वास प्रत्येक संकटों में मुक्ति का साधन है। अल्लाह ने फरमायाः ” जो अल्लाह पर भरोसा करेगा अल्लाह उसके लिए काफी है” ( अल-तलाक़3) हिजरत के समय आप तलवारों की छाया में थे, शत्रु आपके सर की तलाश में “सौर” गुफे के द्वार पर पहुंच चुके थे। अबू-बक्र भी परेशान हो गए। ऐसी गम्भीर स्थिति में आपने उन से फरमायाः “गम न करो, निःसंदेह अल्लाह हमारे साथ है।”

(3)      अल्लाह पर भरोसा होने के साथ ज़ाहिरी माध्यमों को अपनाना भी आवश्यक है। आपने सब से पहले हिजरत का पलान बनाया, नायक मुहम्मद सल्ल0 हैं, सहायक अबू बक्र हैं, खाना पहुंचाने वाली अस्मा हैं, गुफा में क़ुरैश की सूचना पहुंचाने वाले अबू बक्र के बेटे अब्दुल्लाह हैं। बकरियों के रेवड़ द्वारा अब्दुल्लाह के पैर के चिन्ह को मिटा कर शत्रु को धोखे में रखने के लिए आमिर बिन फुहैरा हैं, रास्तों का माहिर गैरमुस्लिम लेकिन अमानतदार अब्दुल्लाह बिन उरैक़ित है। तत्काल निवास सौर पहाड़ है।

(4)      जब अल्लाह अपने मोमिन बन्दों की सहायता का इरादा करता है तो प्रत्येक जाहिरी नियम टूट जाते हैं। तलवारों की छाया में आप निकल जाते हैं, शत्रुओं का एक समूह गुफा के द्वार पर पहुंचने के बावजूद उनको देख नहीं पाता है। सुराक़ा बिन मालिक के घोड़े के दोनों पैर ज़मीन में धंस जाते हैं। उम्मे माबद की मर्यल बकरी के थन में दूध भर आता है।

(5)      हिजरत से हम अल्लाह के रसूल से प्रेम का महान पाठ सीखते हैं। यही प्रेम था जिसने अबू बक्र को खूशी के आँसू रोलाया। यही वह प्रेम था जिसने अबू बक्र को ज़हरीले कीड़े का कष्ट सहन करने पर तैयार किया। यही वह प्रेम था कि अबू बक्र अब तक 35 हज़ार दिरहम खर्ज कर चुके थे और फिर हिजरत की यात्रा में 5 हज़ार दिरहम लेकर निकलते हैं।

(6)      हिजरत से क़ुरबानी का पाठ मिलता है।

(7)      अल्लाह की सहायता पर पूरा विश्वास ( मैं देख रहा हूं ऐ सोराक़ा कि तुम किसरा के कंगन पहने हो)

(8)      अल्लाह के रसूल सल्ल0 की कोशिश कि रास्ते का कोई साथी हो। ( अबू बक्र को साथ ले कर चलने में संकेत है कि एक व्यक्ति हमेशा नेक संगत को अपनाए)

(9)      नायक आदर्श होता है। ( मुहम्मद सल्ल0 के लिए सम्भव था कि अल्लाह उनको बुराक़ पर बैठा कर मदीना पहुंचा देता परन्तु आप मानव के लिए कठिनाइयों को सहन करने में आदर्श न बन सकते थे।

(10)   हर समय दावत का काम होना चाहिए। (इस यात्रा में भी बुरैदा और उनके साथियों को इस्लाम की दावत दी)

 सन् हिजरी का आरम्भ कब और कैसे  ?

मुहर्रम इस्लामी सन् हिजरी का सब से पहला महीना है। यहाँ से नया हिजरी वर्ष आरम्भ होता है। उमर फारूक़ रज़ि0 अन्हु की खिलाफत का तीसरा या चौथा वर्ष था ( अर्थात् हिजरत के सोलहवी अथवा सतरहवीं वर्ष ) हज़रत अबू मूसा रज़ि0 ने आपको पत्र लिखा कि हमारे पास आप के पत्र आते हैं परन्तु उन पर तिथि अंकित नहीं होती, उसी के बाद उमर रज़ि0 ने यह तै किया कि मुसलमानों का एक ऐसा इस्लामी कलैण्डर होना चाहिए जो दूसरे समुदायों से अलग और भिन्न हो। अतः सहाबा से परामर्श किया कि किस घटना से इस्लामी सन् का आरम्भ किया जाए। किसी ने नबी सल्ल0 की पैदाईस को अपनाने का परामर्श दिया तो किसी ने आपकी नुबूवत की तीथि को, तो किसी ने हिजरत को अपनाने की बात कही।

मुसलमान शताब्दियों से बराबर इस इस्लामी सन् हिजरी को अपनाते रहे, यहाँ तक कि 1924 में मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने जहाँ उस्मानी खिलाफत की समाप्ती की घोषणा की वहीं इस्लामी सन् हिजरी पर अमल को भी निरस्त कर दिया और ईसवी कलैण्डर पर अमल अनिवार्य ठहराया।

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अपना काम करते रहिए

December 6th, 2011 by safat alam taimi
9 अपना काम करते रहिएअन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों में से एक प्रवचन लेकर आज हम आप के पास उपस्थित हुए हैं, हम आपसे अनुरोध करेंगे कि आप इस प्रवचन पर चिन्तन-मनन करें और देखें कि संक्षिप्त शब्द में  हिकमत और तत्वदर्शिता का कैसा खज़ाना इसमें समो दिया गया है।
प्रवचन यह हैः “यदि क़यामत का समय आ जाए और तुम में से किसी के हाथ में खजूर के पौधे हों और वह महा-प्रलय के बरपा होने से पहले पौधे को लगा सकता हो तो लगा दे क्योंकि उसे इसके बदले पुण्य मिलेगा।” (सही जामिअ़ हदीस संख्या 1424).
सुनने वालों को  मुहम्मद सल्ल0 को मुख से यह वाक्य सुनने की अपेक्षा भी मुश्किल से हो सकती थी. उन्हें यह उम्मीद हो सकती थी कि मुहम्मद सल्ल0 जो दुनिया में इसलिए भेजे गए थे कि लोगों को परलोक की याद दिलाएँ, इस के लिए काम करने पर उभारें और उन्हें यह निमंत्रण दें कि  महा-प्रलय के भयानक दिन की तैयारी के लिए अपने दिलों को पाक साफ करें, यह बताएं कि ऐसे गम्भीर अवसर पर लोगों को जल्दी से अपने पापों की क्षमा मांगनी चाहिए यदि आप यह कहते तो क्या आश्चर्य की बात होती?
लेकिन मुहम्मद सल्ल0 ने ऐसा कुछ नहीं फरमाया अपितु ऐसी बात फ़रमाई जो सुनने वाले उम्मीद भी नहीं कर सकते थे. आपने यह कहा कि अगर किसी के हाथ में कोई खजूर के पौधे (अर्थात कोई भी पौधे) हों और वह क़यामत से पहले उसे लगा सकता हो तो अवश्य लगा दे क्योंकि उस पर भी उसे पुण्य मिलेगा।
ज़रा सोचिए! खजूर के पौधे लगाने का निर्देश दिया जा रहा है जो कई वर्षों बाद फल दे सकता है और क़ियामत बस कुछ छणों में संसार को नष्ट- भ्रष्ट कर देने वाली है जिसमें कोई संदेह ही नहीं!! क्या ऐसी बात इस्लाम के संदेष्टा की जबाने मुबारक से निकल सकती है….जी हाँ ! इस संक्षिप्त से वाक्य में न जाने कितने अर्थ निहित हैं:
सबसे पहले तो वह इस तथ्य को उजागर करता है कि परलोक का रास्ता दुनिया के रास्ते से होकर गुज़रता है। दुनिया और परलोक के रास्ते भिन्न भिन्न नहीं। दोनों एक ही रास्ते के दो किनारे हैं। ऐसा नहीं है कि प्रलोक सुधारने के लिए संसार त्याग कर दो, सांसारिक भोगों से कट जाओं। दीन और दुनिया के रास्ते अलग अलग न करो अपितु दोनों रास्ता एक ही हैं और वह है अल्लाह की ओर ले जाने वाला रास्ता।
इस हदीस से यह पाठ भी मिलता है कि धरती से एक क्षण के लिए भी परिणाम से निराशा के कारण काम नहीं रोकना चाहिए। यहाँ तक कि यदि एक क्षण बाद ही महा-प्रलय आने वाला हो, संसार से मानव जीवन का सिलसिला ही टूट जाने वाला हो और उसके प्रयास का कोई प्रत्यक्ष परिणाम न निकल सकता हो, तब भी लोगों को काम नहीं रोकना चाहिए, उन्हें भविष्य को आशा के साथ देखना चाहिए।
आज के आलस्य मुसलमानों के सामने मुहम्मद सल्ल0 का यह आदर्श है, यदि वह इस से पाठ लेना चाहें। इस प्रवचन के आधार पर उनकी ज़िम्मेदारी बनती है कि वह निरंतर काम करते रहें और थकने का नाम न लें। वह पौधे लगाएँ चाहे महा-प्रलय अगले ही क्षण आने वाला हो। वह यह न सोचें कि हम इस से लाभ न उठा सकेंगे। उनका काम है करते रहना परिणाम के चक्कर में न पड़ना।
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क्या किसी की धरोहर का परिचय कराना अपराध है ?

September 15th, 2011 by safat alam taimi

 Maine Irish Heritage Center interior1 198x300 क्या किसी की धरोहर का परिचय कराना अपराध है ?यदि किसी से कहा जाए कि तुम इस्लाम स्वीकार कर लो तो उसका स्वभाविक रूप में यही प्रश्न होगा कि हम आखिर इस्लाम स्वीकार क्यों करें ? विदित है कि जिस धर्म का वह बाल्यावस्था से पालन करता आ रहा है किसी के कहने के उसे कैसे त्यागा जा सकता है। लेकिन जब बात यह हो कि किसी की धरोहर एक ज़माना पहले खो गई हो, अचानक कोई व्यक्ति उसके पास आकर उसका परिचय कराने लगता है, फिर वह स्वयं देखता है कि उस पर उसका नाम भी अंकित है तो स्पष्ट है कि वह उसे अपनाने में तनिक भी संकोच न करेगा। एक दूसरी उदाहरण लीजिए यदि किसी बच्चे को बाल्यावस्था ही में अपनी माता से दूर कर दिया जाता है, यहाँ तक कि वह किशोरावस्था तक पहुंच जाता है, फिर कोई उसे अपनी माँ के पास लेकर जाए तो स्वभाविक रूप में अपनी माता को नहीं पहचानेगा परन्तु जब उसके परिवार के लोग माता का उससे परिजय कराएंगे तो फिर उसी महिला को जिसे पराई समझ रहे था “मम्मी” कह कर पुकारने लगेगा।

इस्लाम का संदेश बिल्कुल ऐसा ही है। यह हमारे ऊपर वाले एक ईश्वर की ओर से अवतरित किया गया पू्र्ण रूप में सुरक्षित संदेश और उत्तम उपहार है जो मात्र मुसलमानों हेतु नहीं अपितु सम्पूर्ण संसार का मार्गदर्शक है। बड़े खेद की बात है कि यदि कोई सज्जन उसकी अपनी ही अमानत उसकी सेवा में पेश करना चाहता हैं तो उसकी भावनाओं का अपमान करते हुए उस पर धर्म प्रचार का आरोप लगाने लगते हैं। क्या किसी की धरोहर का परिचय कराना अपराध है। क्या कोई हवा, पानी, सूर्य तथा चंद्रमा के प्रकाश से लाभांवित होना मात्र इस कारण छोड़ देगा कि मुसलमान भी इस से लाभांवित होते हैं। नहीं और कदापि नहीं. तो फिर अल्लाह के  प्राकृतिक धर्म का विरोद्ध क्यों जो मानव के लिए ही अवतरित हुआ है ?

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नमाज़ में की जाने वाली कुछ ग़लतियाँ

September 7th, 2011 by safat alam taimi

 images नमाज़ में की जाने वाली कुछ ग़लतियाँइमाम के पीछे नमाज़ी का ऊँचे स्वर में क़ेराअत करनाः कुछ लोग जमाअत की नमाज़ों में ज़ोर जो़र से क़ेराअत करके दूसरे नमाज़ियों की नमाज़ में खलल डालते हैं। इमाम के पीछे सूरत ज़ोर ज़ोर से पढ़ना शुरू कर देंगे मानो वह यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि उन्होंने उसे कंठस्थ कर रखा है। हालाँकि नबी सल्ल0 ने फरमायाः “सुन लो!तुम में से हर एक नमाज़ में अपने रब से बात कर रहा होता है। अतः बिल्कुल कोई दूसरे को कष्ट न पहुंचाए, न कोई किसी के सामने अपनी आवाज़ को ऊँचा करे।” (अबू-दाऊद)

नमाज़ के बीच विभिन्न प्रकार की हरकतें करनाः कुछ नमाज़ी अपनी नमाज़ों में श्रद्धा का ख्याल किए बिना नमाज़ में विभिन्न प्रकार की हरकतें करते रहते हैं। कोई हाथ की घड़ी में देख रहा है, कोई दाढ़ी पर हाथ फेर रहा है, कोई कपड़े से मिट्टी झाड़ रहा है, कोई नाक से खेल रहा है, तो कोई पीठ खुजला रहा है इत्यादी। लगता ही नहीं कि वह अपने मालिक और संसार के सृष्टिकर्ता के सामने खड़े हुए हैं। ज़रा सोचिए कि उनमें से यदि कोई दुनिया के किसी बड़े आदमी के सामने खड़ें होते तो ऐसी हरकतें कर सकते थे? कदापि नहीं, तो फिर अपने मालिक के सामने ऐसा क्यों।

आयतों के संदर्भ को समझे बिना इमाम की क़ेराअत पर रोना चिल्लानाः नमाज़ में कुछ आयतें जहन्नम, यातना और प्रलोक से सम्बन्धित होती हैं जिन्हें सुन कर एक व्यक्ति का ह्रदय विनर्म पड़ जाता और आँखों से आंसू जारी हो जाते हैं और यह अच्छी बात है लेकिन कुछ लोग हर नमाज़ में रोना और चींखना शूरू कर देते हैं चाहे पढ़ी जाने वाली आयतें जन्नत और जहन्न से सम्बन्धित हों अथवा हैज़ या निफास से सम्बन्धित। विदित है कि इस से दूसरे नमाज़ियों को परेशानी होती है।

परागंदा क्षवि में मस्जिद आना:  निर्धनता कोई ऐब नहीं, कितने निर्धन साफ सुथरे कपड़े पहन कर मस्जिद जाते हैं जबकि कितने ऐसे सुखी और सम्पन्न लोगों का हाल यह होता है कि जब बाज़ार जाएं तो बड़े बन-संवर कर जाएं लेकिन मस्जिद आना हो तो फक़ीराना और परागंदा क्षवि बना लेते हैं हालांकि ऐसा करना बिल्कुल सही नहीं।

नमाज़ियों के आगे से गुज़रनाः कुछ नमाज़ी नमाज़ समाप्त होते ही मस्जिद से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं और उन लोगों का बिल्कुल लेहाज़ नहीं करते जो अपनी छूटी हुई नमाज़ें अदा कर रहे होते हैं। यदि उन्हें नमाज़ियों के आगे से गुज़रने के पाप का सही ज्ञान हो जाए तो कदापि ऐसा न करें और नमाज़ी की नमाज़ समाप्त होने तक प्रतीक्षा करते रहें। नबी सल्ल0 ने फरमायाः “यदि नमाज़ी के सामने से गुज़रने वाला यह जान ले कि उसका क्या पाप है तो उसका चालीस (वर्ष) तक प्रतीक्षा में खड़े रहना उसके लिए बिहतर है।”  (सहीह बुख़ारी)

नमाज़ में आसमान की ओर निगाह उठानाः नबी सल्ल0 ने इस बात से मना फरमाया कि नमाज़ी नमाज़ की स्थिति में अपनी निगाह आसमान की ओर उठाए, बल्कि आपने सख्ती से फरमाया कि ऐसा करने वालों की निगाहें उचक न ली जाएं।(मुस्नद अहमद) आपने यह बात भी स्पष्ट कर दी कि नमाज़ में खड़े होते समय एक व्यक्ति की निगाह उसके सज्दे के स्थान पर टिकी होनी चाहिए। जबकि कुछ नमाज़ी नमाज़ में कभी छत की ओर देखते होते हैं मानो अल्लाह को देख रहे हैं तो कुछ लोग दाएं बाएं झाँक रहे होते हैं।

लम्बे स्वर में खींच कर देर तक आमीन कहनाः जहरी नमाज़ों में ऊँची आवाज़ से आमीन कहना अल्लाह के रसूल सल्ल0 की सुन्नत है क्योंकि फरिश्ते भी इस पर आमीन कहते हैं और जिसकी आमीन फरिश्तों की आमीन से सहमत हो गई उसके पाप क्षमा कर दिए जाते हैं। इस लिए होना यह चाहिए कि आमीन एक साथ कही जाए और ऊँचे स्वर में ताकि सुनी जा सके। जबकि देखा यह जाता है कि कुछ लोग बिल्कुल आमीन कहते ही नहीं जबकि दूसरे कुछ लोग इतना लम्बा “आमीन” कहते हैं कि सब लोगों के आमीन से फारिग़ होने के बावजूद वह आमीन को खींचते रहते हैं जिससे अन्य नमाज़ियों को तक्लीफ होती है।

नाफ के नीचे अथवा गर्दन के निकट हाथ बाँधनाः नमाज़ में हाथ बाँधने के सम्बन्ध में सब से सही बात यह है कि दोनों हाथ सीने पर बाँधे जाएं, इस प्रकार कि दायाँ हाथ बाएं हाथ पर नाफ से ऊपर और छाती के नीचे हो।

हल्ब बिन ताई रजि0 बयान करते हैं कि “मैंने नबी सल्ल0 को देखा कि हाथों को सीने पर बाँधे हुए थे।” (मुस्नद अहमद) लेकिन कुछ लोग इसके विपरीत नाफ के नीचे हाथ बाँधते हैं तो कुछ लोग गर्दन के बिल्कुल क़रीब और इन परिस्थितियों में आप स्वंय उनकी परेशानी का अनुभव कर सकते हैं।

पेशाब या पाखाना को रोक कर नमाज़ पढ़नाः एक ही वज़ू से बहुत सी नमाज़ें पढ़ने के कुछ इच्छुक कभी कभी पेशाब या पाखाना रोक कर नमाज़ पढ़ने लगते हैं। जबकि अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने पेशाब या पाखाना रोक कर नमाज़ पढ़ने से मना फरमाया है। यदि किसी को ऐसी सूरत पेश आ जाए कि जमाअत खड़ी हो चुकी हो और उसे शौचालय जाने की आवश्यकता हो तो वह पहले शौचालय जा कर अपनी ज़रूरत पूरी करे। नबी सल्ल0 का फरमान हैः ” जब खाना उपस्थित हो तो नमाज़ नहीं होती और न उस समय जब पेशाब या पाखाना उसे धकेल (निकलने के लिए ज़ोर लगा) रहा हो”। (मुस्लिम)

इस लिए अल्लाह के रसूल सल्ल0 के आदेश की मुखालफत करने की बजाए पहले शौचालय से फारिग हो जाएं फिर नमाज़ शुरू करें ताकि पूरी श्रद्धा से नमाज़ पढ़ सकें।

सफों को बराबर न करनाः सामान्य रूप में यह देखने को मिलता है कि नमाज़ी अपनी नमाज़ों में सफें सीधी करने का ज्यादा ख्याल नहीं करते और अपने बीच में खाली जगह छोड़ कर खड़े होते हैं हालाँकि यह तरीक़ा प्यारे नबी सल्ल0 की नमाज़ के तरीक़े के विपरीत है। नबी सल्ल0 ने फरमायाः “सफें ठीक कर लो, कंधे बराबर कर लो, सफ के बीच खाली रह जाने वाले स्थान को भर लो, अपने भाइयों के लिए नरम हो जाओ और शैतान के लिए जगह न छोड़ो। जो व्यक्ति सफ को मिलाएगा अल्लाह उसको मिलाएगा और जो व्यक्ति सफ को तोड़ेगा अल्लाह उसको तोड़ेगा।” (अबू दाऊद)

एक मस्जिद में एक ही समय दो जमाअत करनाः मस्जिद में प्रत्येक उपस्थितगणों का एक इमाम के पीछे नमाज़ की अदाएगी को जमाअत कहते हैं। लेकिन कभी कभार यह देखने को मिलता है कि पहली जमाअत समाप्त होने के बाद दो दो जमाअतें एक ही मस्जिद में एस ही समय क़ाइम कर ली जाती हैं। और यह कभी तो इमाम की गलती के कारण होता है कि इमान की आवाज़ धीमी होने के कारण देर से आने वालों को पता न चल सका कि दूसरी जमाअत खड़ी हुई है और कभी मुक़तदी की गलती के कारण होता है कि जल्दी दाखल होने के कारण यह विश्वास प्राप्त करने की चेष्टा नहीं की कि जमाअत खड़ी हुई है, और इस तरह दूसरी जमाअत खड़ी कर ली।

रुकू में कमर और घुटने सीधा न रखनाः कुछ नमाज़ी रुकू के बीच या तो सर को नीचे झुकाए रखते हैं या फिर सर को बहुत ऊँचा रखते हैं, यह दोनो शक्लें ग़लत हैं। हालाँकि सर को न ज़्यादा झुकाया जाए और न ज़्यादा उठा कर रखा जाए बल्कि कमर और सर दोनों बराबर होना चाहिए कि यदि उस पर पानी बहाया जाए तो ठहर जाए। नबी सल्ल0 ने फरमायाः “एक व्यक्ति साठ वर्ष नमाज़ें पढ़ता है लेकिन उसकी एक नमाज़ भी स्वीकार नहीं की जाती, इस लिए कि वह कभी रुकू ठीक करता है तो सज्दा सही नहीं करता और अगर सज्दा ठीक करता है तो रुकू सही नहीं करता।” (अत्तरगीब वत्तरहीब)

कुछ नमाज़ी रुकू की स्थिति में घुटने पर दोनों हाथ रखने की बजाए जाँघ पर रखते हैं जबकि कुछ दूसरे घुटने से बिल्कुल नीचे टखने के क़रीब तक दोनों हाथों को ले जाते हैं जो कि ग़लत है। सही तरीक़ा यह है कि रुकू की स्थिति में कमर को बिल्कुल सीधा रखा जाए और दोनों हथेलियाँ घुटने पर टिकी हुई हों।

सज्दे की स्थिति में केहनियों को ज़मीन पर बीछाना या हथेलियों को बिल्कुल सीधा खड़ा रखनाः सज्दे में कुछ लोग केहनियों को ज़मीन पर बिछा लेते हैं हालाँकि नबी सल्ल0 ने इस तरीक़े को कुत्ते से तशबीह देते हुए फरमाया कि “कोई अपने बाज़ूओं को कुत्ते के समान ज़मीन पर न फैलाए” । (बुखारी, मुस्लिम) जबकि कुछ लोग अपनी हथेलियों को मोड़े हुए बिल्कुल खड़ा रखते हैं। जबकि सही तरीका़ यह है कि हथेलियाँ ज़मीन पर रखी जाएं इस प्रकार कि ऊँगलियाँ मिली हुई हों और क़िबला की ओर हों और केहनियाँ ज़मीन से उठी हुई हों। उसी प्रकार पैर की ऊँगलियाँ भी क़िबला की ओर हों।

सलाम फेरते ही ज़ोर से बातें करने लगनाः कुछ नमाज़ी सलाम फेरने के बाद यह भूल जाते हैं कि वह मस्जिद में हैं और अपने साथी के साथ वार्ता और हंसने हंसाने में लग जाते हैं मानो किसी चाए की दुकान में बैठे हों। हालांकि उस समय कितने नमाज़ी अपनी नमाज़े पूरी कर रहे होते हैं, कितने सुन्नतें पढ़ रहे होते हैं। यदि कोई ऐसी स्थिति में उन्हें टोक दे तो दिल मैला कर लेते हैं।

नियत का ज़बान से अदा करनाः कुछ लोग जमाअत की नमाज़ में देर से आते हैं और ज़ोर से तकबीर कहते हुए नमाज़ में दाखिल होते हैं, बल्कि कुछ लोग नियत के शब्द भी ज़बान से अदा करते हैं ” मैं इमाम के पीछे चार रकअत ज़ुहर की नमाज़ अदा करने की नियत करता हूं, मुँह मेरा क़िबला की ओर, अल्लाहु अकबर” हालाँकि ऊँची आवाज़ से “अल्लाहु अकबर”कहना या नियत के शब्द ज़बान से बोलना प्यारे नबी सल्ल0 और आपके साथियों से प्रमाणित नहीं। और इस लिए भी कि नियत दिल के संकल्प का नाम है अतः जबान से नियत के शब्द बोलने की आवश्यकता ही नहीं। अल्लामा इब्ने तैमिया रहि0 फरमाते हैं:

“ज़बान से नियत करना शास्त्र और बुद्धि दोनों के विपरीत है, शास्त्र के विपरीत इस लिए कि यह बिदअत है। और बुद्धि के विपरीत इस लिए कि उसकी उदाहरण ऐसे ही है जैसे कोई खाना खाना चाहता हो तो कहे “मैं नियत करता हूं अपने हाथ को इस बर्तन में रखने की, मैं इस से एक लुक़मा लूंगा, फिर उसको मुंह में रखूंगा, फिर उसको चबाऊँगा, अंततः उसको निगल लूंगा ताकि मैं तुष्टि पा सकूं। विदित है कि कोई बुद्धिमान इस प्रकार के शब्द नहीं बोलेगा क्योंकि नियत करना इस बात का प्रमाण है कि नियत करने वाले को मआमले का पूरा पूरा ज्ञान है। जब आदमी को पता है कि वह क्या कर रहा है तो पक्की बात है कि उसने इस काम की नियत भी ज़रूर की होगी।” ( फतावा इब्ने तैमिया 1/232)

 प्याज़ अथवा लहसुन खाकर मस्जिद जाना और डकार लेते रहनाः यदि प्रत्येक नमाज़ी नहीं तो अधिकतर लोग यह जानते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने प्याज़ या लहसुन आदि खा कर मस्जिद आने से मना किया है ताकि वह अपने मुंह से निकलने वाली गंध से फरिश्तों और इनसानों को कष्ट पहुंचाने का कारण न बने। (मुस्लिम) उसके बावजूद आप कितने लोगों को देखेंगे कि वह मस्जिद में डकार ले कर अपने मुँह की गंध से दूसरों को कष्ट पहुंचाते हैं।

नमाज़ में इमाम का अनुसरण न करनाः जमाअत की नमाज़ में न तो इमाम से आगे निकलना चाहिए और न ही इमाम के बिल्कुल पीछे रहना चाहिए कि इमाम सज्दा से उठ जाए और वह अभी सज्दे ही में हो, इमाम रुकूअ में चला जाए और वह अभी क्याम ही में हो। क्योंकि यह तरीक़ा अल्लाह के नबी सल्ल0 के आदेश के विपरीत है जिसमें आया है कि “इमाम इस लिए बनाया गया है ताकि उसकी ताबेदारी की जाए”। सही तरीका यह है कि इमाम के साथ रुकू, सज्दा और क्याम किया जाए ताकि वास्तव में जमाअत की नमाज़ कही जा सके। और जो कोई लम्बा रुकू या सज्दा करने का इच्छुक हो वह नफ्ली नमाज़ों में जैसे चाहे कर सकता है।

खुतबए-जुमा के समय बात करनाः जुमा का खुतबा नमाज़ का ही भाग है इस लिए जुमा के दिन मस्जिद में बैठ कर इमाम का ख़ुतबा खामोशी के साथ सुनना चाहिए, लेकिन देखने में आता है कि कुछ लोग अज्ञानता के कारण देर से आने वालों को सलाम करते हैं, तो कुछ लोग बच्चों को नसीहत करते हैं जबकि कुछ लोग खतीब की बात पर टिप्पणी कर रहे होते हैं मानो वह मस्जिद में नहीं किसी सिनेमा हाल में हैं।

नमाज़ में जंभाई लेनाः जंभाई ज़ाहिर में थकान और सुस्ती की निशानी होती है, इसका कारण जो भी हो हम में से हर व्यक्ति किसी विद्वान से भेंट करते समय उसे दूर करने का सम्भवतः प्रयास करता है। तो फिर उस समय इसका ज्यादा ही ख्याल रखना चाहिए जबकि नमाज़ी नमाज़ में अपने रब से बात कर रहा होता है। नबी सल्ल0 ने फरमायाः “जब नमाज़ के बीच किसी को जंभाई आ रही हो तो सम्भवतः उसे रोक ले, क्योंकि जंभाई द्वारा शैतान अन्दर प्रवेश करता है।” (सहीह मुस्लिम, सहीह बुखारी) और जब शैतान नमाज़ी के अन्दर प्रवेश कर गया तो फिर नमाज की खैर नहीं, उसी प्रकार जंभाई लेने वाले परशैतान हंसता है, इस लिए जिस हद तक सम्भव हो सके नमाज़ में जंभाई को रोकने का प्रयास करना चाहिए।

मुक़तदी के खड़ा होने का स्थानः पहली सफ पूरी होने के पश्चात मस्जिद में आने वाले जब दूसरी अथवा तीसरी सफ बनाना चाहते हों तो कोई दाएं ओर की श्रेष्टा वाली हदीस के आधार पर इमाम के दाएं ओर खड़ा होने का प्रयास करते हैं तो कोई बाएं ओर खड़े हो जाते हैं कि उस तरफ पंखा चल रहा होता है हालाँकि सही तरीक़ा यह है कि इमाम के बिल्कुल पीछे नई सफ बनाई जाए चाहे इमाम के खड़ा होने की जगह बीच सफ हो या सफ का किनारा हो।

इमाम के पीछे सूरः फातिहा की क़ेराअत ज़ोर से करनीः इमान के पीछे जहरी नमाज़ो में सूरः फातिहा पढ़ने की गुंजाइश ज़रूर है परन्तु इमाम के साथ ज़ोर ज़ोर से पढ़ने लगना जिसके कारण दूसरे नमाज़ियों को कष्ट हो किसी स्थिति में उचित नहीं। इस लिए जो लोग जमाअत में सूरः फातिहा पढ़ें उन्हें चाहिए कि धीमी आवाज़ में पढ़ें ताकि उनके साथ खड़े होने वाले नमाज़ी को तकलीफ न हो।  

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