इस्लाम जन-सेवा का आदेश देता है

helpinghandsइस्लाम में अल्लाह के अधिकार के तुरन्त बाद मानव के अधिकार के पालन का आदेश दिया गया है। क़ुरआन कहता हैः “नेकी और भलाई के काम में एक दूसरे की सहायता करो।” (अल-माईदा 2″)मुहम्मद सल्ल. की जीवनी का अध्ययन करें तो पाएंगे कि आप बाल्यावस्था से ही जनसेवा में ग्रस्त रहे, जब चालीस वर्ष की आयु में मुहम्मद सल्ल. पर हिरा की गुफा में प्रथन वह्य अवतरित हुई और चिंतित होकर अपनी पत्नी खदीजा रज़ि. के पास आए और उनसे पूरी घटना सुनाते हुए कहा कि मुझे अपनी जान का भय हो गया है। उस अवसर पर खदीज़ा ने साहस दिलाते हुए आपके जन सेवा को गिनाया कि अल्लाह आपको कदापि अपमानित न करेगा कि आप रिश्तेदारों का ख्याल रखते हैं, निर्धनों का बोझ उठाते हैं, मेहमानों का सत्कार करते हैं और कठिनाइयों के मारों का साथ देते हैं। मानो खदीजा यह कहना चाहती थीं कि जिस महान व्यक्ति के यह गुण हों वह अपमानित कैसे हो सकते हैं।आपने जन सेवा के महत्व को एक शब्दों में समेट दिया है कि “लोगों में सब से श्रेष्ठ वह व्यक्ति है जो लोगों के लिए अधिक लाभदायक हो।” (सहीह अल-जामिअ)
यहाँ तक कि आपने यह फरमा दिया कि:”जिस के पास अपनी आवश्यकता से अधिक सवारी है वह एहसान के तौर पर ऐसे व्यक्ति को दे दे जिसके पास सवारी नहीं है।” (मुस्लिम)
बात यहीं पर स्माप्त नहीं होती बल्कि इस्लाम ने जन सेवा पर विभिन्न प्रकार के पुण्य भी रखा इसी लिए अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमायाः “जो अपने भाई की ज़रूरत पूरी करने में लगा हो अल्लाह उसकी ज़रूरत पूरी करता है, जो कोई किसी मुसलमान की परेशानी को दूर करता है अल्लाह उस से क्यामत के दिन की कठिनाइयों में से बड़ी कठिनाई को दूर करेगा।” (बुखारी, मुस्लिम)
इस्लाम ने तो पशु पक्षियों पर भी एहसान करने पर सवाब रखा हैः अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमायाः “एक बार एक व्यक्ति रास्ते पर चला जा रहा था कि उसे सख्त प्यास लगी, उसने एक कुंवा पाया तो उसमें उतर कर उसने पानी पिया, फिर बाहर निकल आया तो देखा कि एक कुत्ता प्यास के मारे ज़बान बाहर निकले हांपते हुए कीचड़ चाट रहा है। उस व्यक्ति ने सोचा कि इस कुत्ते को भी उसी तरह प्यास लगी हुई है जिस तरह मुझे लगी थी। अतः वह दोबारा कुंवे में उतरा और अपना मोज़ा पानी से भरा और उसे अपने मुंह से पकड़े ऊपर चढ़ आया और कुत्ते को पानी पिलाया। अल्लाह ने उसके इस नेक काम के कारण उसके पापों को क्षमा कर दिया। (बुखारी, मुस्लिम)
एक सच्चे मुसलमान की यह पहचान है कि उसके द्वारा दूसरों को लाभ पहुंचे, उसका अस्तित्व मानवता के लिए लाभदायक हो. अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमाया: “अल्लाह के पास सबसे प्रिय व्यक्ति वह है जो लोगों को सबसे अधिक लाभ देने वाले हो अल्लाह के पास सबसे पसंदीदा प्रक्रिया यह है कि किसी मुसलमान के दिल में खुशी की लहर दौड़ा दो, या किसी की परेशानी दूर कर दो, या उसका कर्ज़ अदा कर दो, या उसकी भूख मिटा दो, मैं किसी मुसलमान की जरूरत पूरी करने के लिए चलूं, यह मेरे लिए मस्जिद (नबवी) में एक महीना एतकाफ में बैठने से बेहतर है “. (तबरानीःसहीह)
इसके विपरीप एक दूसरा परिणाम देखिए रसूल सल्ल. ने फरमाया कि एक महिला को एक बिल्ली के कारण अज़ाब दिया गया। उसने बिल्ली को बांध रखा था, उसे न खिलाती थी और न खोलती थी कि ज़मीन के कीड़े मकूड़े खा लेती, जिस से वह मर गई अतः इसके कारण वह नरक में गई। (बुखारी, मुस्लिम)
रास्ते से कष्टदायक वस्तु को हटा देना इस्लाम की दृष्टी में इतना बड़ा कार्य है कि सही मुस्लिम की रिवायक के अनुसार अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमायाः” मैं ने एक व्यक्ति को जन्नत में फिरते देखा ( उसके जन्नत में प्रवेश करने का कारण यह था कि) उसने वृक्ष अथवा उसकी टेहनी को काट दिया था जो रास्ते की बीच में थी और लोगों को इसके कारण कष्ट होता था। “

समाज में अमीरी और गरीबी क्यों ?

rich-man-poor-manअल्लाह ने रोज़ी का वितरण अपने हाथ में रखा है, कुछ लोगों को अधिक से अधिक दिया तो कुछ लोगों को कम से कम, हर युग में और हर समाज में मालदारा और गरीब दोनों का वजूद रहा है, सवाल यह है कि आखिर अल्लाह ने अमीरी और गरीबी की कल्पना क्यों रखी? 

इसका उत्तर यह है कि ऐसा अल्लाह ने बहुत बड़ी तत्वदर्शिता के अंतर्गत किया।  ताकि एक वर्ग दूसरे वर्ग के काम आ सके, प्रत्येक की आवश्यकताएं एक दूसरे से पूरी होती रहें। अल्लाह ने फरमायाः 

“और एक को दूसरे पर प्रधानता प्रदान किया ताकि तुम्हें आज़माए उन चीज़ों में जो तुम को दी है. (सूरः अनआन 165) 

 मान लें कि यदि सभी लोग मालदार हो जाते तो लोगों का जीवन बिताना कठिन होता, एक का काम दूसरे से हासिल नहीं हो सकता था, और हर एक दूसरे पर आगे बढ़ने की कोशिश करता,  इस प्रकार देश और समाज का विनाश होता. जबकि लोगों के स्तर में अंतर होने के कारण अल्लाह ने जिसे कम दिया है उसे कल महाप्रलय के दिन यदि वह ईमान वाला रहा तो वहां की नेमतों से मालामाल करने का वादा किया है। 

उसी प्रकार निर्धनों को कुछ ऐसी हार्दिक शान्ति प्रदान की है जिस से मालदारों का दामन खाली है।  इसके साथ साथ अल्लाह ने उनके प्रति लोगों के मन में दया-भाव, शुभचिंतन, सहानुभूति की भावना पैदा की, और मानव समाज का अंग सिद्ध किया ताकि धनवान उनका ख्याल करें, यही नहीं अपितु मालदारों को गरीबों पर खर्च करने का आदेश दिया, और उनके मालों में गरीबों का अधिकार ठहराया। अल्लाह तआला ने फरमायाः 

अल्लाह के माल में से तुम उन्हें (निर्धनों को) दो जो उसने तुम्हें दिया है। (कुरआनः सूरः नूरः 33)

पता यह चला कि इंसान के पास जो कुछ है उसका अपना नहीं है बल्कि अल्लाह का दिया हुआ है, इस लिए यदि मनुष्य कुछ पैसे अल्लाह के रास्ते में खर्च करता है तो उसे इस पर गर्व का कोई अधिकार नहीं है।
यह है अल्लाह की वह हिकमत जिस से हमें समाज में निर्धनों के वजूद के प्रति संतुष्टी प्राप्त होती है परन्तु यह कहना कि वह हीन अथवा तुच्छ हैं या उनके पापों का परिणाम है, या उनको किसी विशेष जाकि की सेवा हेतु पैदा किया गया है, बुद्धिसंगत बात नहीं लगती।
आज भारतीय समाज में यही विचार फैलने के कारण कुछ वर्ग पशुओं के समान जीवन बिता रहे हैं। उनको कोई अधिकार प्राप्त नहीं है और स्वयं उन्हों ने भी इस प्रथा को स्वीकार कर लिया है जो मावन जाति पर बहुत बड़ा अत्याचार है।
इस्लाम ऐसे वर्गों की हर प्रकार से सहायता करने का आदेश देते हुए मालदारों के मालों में उनका अधिकार रखता है और उनको निर्धन होने के कारण किसी भी मानवीय अधिकार से वंचित नहीं रखता। यह है  मानव स्वभाव से मेल खाने वाला इस्लाम का प्राकृतिक नियम…  

पूंजीवाद और समाजवाद की तुलना में ज़कात का इस्लामी नियम

 capitalismयदि कमाई का सारा अधिकार कमाने वाले से छीन लिया जाए तो मनुष्य के अंदर कोशिश करने की भावना नहीं रहती,खोज-परख की शक्ति बाकी नहीं रहती. और वह हर्ष व उल्लास नहीं रहता जो इंसान को अपनी कोशिश का नतीजा देख कर प्राप्त होता है. अगर यह भावना मनुष्य से छीन ली जाए तो इंसान के अंदर अपने माल को विकसित करने की भावना नहीं रहेगी, उसके जीवन का जोश और उत्साह ठंडा पड़ जाएगा. यही दृष्टिकोण पैदा हुआ था रूस में समाजवाद के नाम से कि उत्पादन जनता की संयुक्त संपत्ति है, जिसमें सब को बराबर का हिस्सा मिलेगा, कमाई किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होगी …. फिर क्या हुआ?  

कुछ वर्षों के बाद यह व्यवस्था स्वयं अपनी मौत मर गई और संसार में उसका नाम व निशान भी न रहा। इस प्रणाली की तुलना में एक और प्रणाली आयी जिसका नाम दुनिया ने पूंजीवाद रखा, इस प्रणाली ने व्यक्ति को उत्पादन का ऐसा मालिक बना दिया जिस में दोसरों का कण बराबर भी अधिकार नहीं रखा गया. यही वह प्रणाली है जो पूरी दुनिया में आज प्रचलित है, इस प्रणाली के कारण कुछ लोगों की मुट्ठी में दुनिया की दौलत घूम रही है, लोग वैध और अवैध की परवाह किए बिना पैसे इकट्ठा कर रहे हैं, यहाँ एक वर्ग मालदार से मालदार तर होता जा रहा है तो दुसरा वर्ग गरीब से गरीब तर होता जा रहा है. इसलिए आज दनिया इस प्रणाली से थक चुकी है और इसके विरोध  दुनिया के कोने कोने में प्रति दिन विरोध हो रहा है।
इन दोनों के बीच इस्लाम ने जो तीसरी प्रणाली दी वह अति उचित प्रणाली है कि न तो एक व्यक्ति की कमाई को सरकार की संपत्ति ठहराया कि सब को उसमें समान अधिकार मिले न मनुष्य को अपनी कमाई पर यूं सांप बना कर बैठा दिया कि उसमें किसी अन्य का कोई अधिकार ही न हो। इस्लाम ने प्राकृतिक व्यवस्था यह दिया कि इंसान अपनी मेहनत से जो कुछ कमाता है वह उसी की संपत्ति है लेकिन उसके माल में समाज के गरीबों और निर्धनों का भी अधिकार है। यदि उसकी सम्पत्ति इस्लाम की निर्धारित मात्रा को पहुंच रही है तो नमाज़ रोज़े के समान उस पर जरूरी है कि अपने माल से एक साधारण मात्रा में गरीबों के लिए निकाले …. इसी को इस्लाम की शब्दावली में ज़कात कहा जाता है।

इस्लाम मानव के बीच से भेदभाव को मिटाता है

 359xnv9 इस्लाम रंग नस्ल और जाति के अंतर को मिटाकर सारी मानवता को एक कर देता है। सारे इनसनों को एक माँ बाप की संतान ठहराता है,जिनके बीच कोई भेदभाव,जातीय पक्षपात और उच्च्यता नहींइस प्रकार इस्लाम विश्व भाईचारा स्थापित करता हैः 

“ऐ लोगो! हमने तुम सब को एक ही पुरुष एवं स्त्रि से पैदा किया तथा कबीलों और समुदायों में बांट दिया ताकि एक दूसरे को पहचान सको, अल्लाह के निकट तुम में उत्तम वह है जो अल्लाह का सबसे अधिक डर रखने वाला हो।” (सूरः हुजरात 13)

 अन्तिम हज्ज के अवसर पर मुहम्मद सल्ल0 ने अपने एक लाख 44 हज़ार अनुयाइयों के समूह को सम्बोधित करते हुए यही बात कही थीः

” किसी अरबी को किसी अजमी पर, और किसी अजमी को किसी अरबी पर , किसी गोरे को किसी काले पर और किसी काले को किसी गोरे पर कोई श्रेष्टता नहीं। श्रेष्टता का आधार अल्लाह का संयम है। (मुस्नद अहमद) 

इसी लिए इस्लाम में दुनिया के किसी कोने के लोग जब प्रवेश करते हैं तो यहाँ पर समान स्थान प्राप्त करते हैं उसके बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं रखा जाता कि सारे मानव आदम की संतान हैं।

इस्लाम हमें अपने निर्माता और मालक से मिलाता है

 safe_image इस्लाम हमें उस ईश्वर और अल्लाह से मिलाता है जो अकेला हैउस का कोई साझीदार नहींवह अद्वितीय हैअनादी हैअनन्त है और अविनाशी हैउसी ने इस पूरी सृष्टि की रचना कीवह किसी काम के लिए किसी का मुहताज नहीं हैप्रकृती और जीव भी अपने आप नहीं हैंउनको भी अल्लाह ही ने उत्पन्न किया है। उसी की आज्ञानुसार सब कुछ होता है । वह न खाता हैन पिता हैऔर न सोता है। वही रोगी को अच्छा करता हैवही तकलीफों को दूर करता है । वह किसी का मुह़ताज नहीं और न उसे किसी चीज़ की ज़रुरत । वही अकेला इबादत और प्रार्थाना का अधिकारी हैबाक़ी सब उसके पुजारी और उपासक हैं,चाहे वह कैसा ही गुणवान हो ।वह पिता पुत्र पति पत्नी जैसे संम्बन्धों से मुक्त हैउसी प्रकार वह किसी भी प्राणी का रुप धारण नहीं करतान वह किसी कार्य के लिए शरीर धारण करने पर बाध्य है । उसने केवल अपनी इच्छा शक्ति से इतने बढे सृष्टि की रचना कर दी तो किसी कार्य के लिए उसको शरीर धारण करने की क्या आवश्यकतायह उसकी पवित्रता के विरुद्ध है । इस्लाम हमारे माथे का सम्मान करता है कि उसे केवल अल्लाह के सामने ही झुकना चाहिए जिसने हमें, हमारे पूर्वजों को और संसार के प्रत्येक जीव को पैदा किया, हम पर हर प्रकार के उपकार किए तो स्वाभाविक रूप में पूजा भी तो उसी एक अल्लाह की होनी चाहिए। क़ुरआन कहता हैः

ऐ लोगो! अपने उस पालनहार की इबादत करो जिसने तुम को और तुम से पहले के लोगों को पैदा किया ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ। जिसने तुम्हारे लिए धरती को बिछावन और आकाश को छत बनाया, और आकाश से वर्षा की और उस से फल पैदा कर के तुम्हें जीविका प्रदान की। अतः यह जानते हुए किसी को अल्लाह का भागीदार न बनाओ।”  (सूरः2 आयत 21-22)  

इस्लाम एक जीवन व्यवस्था है

 Coral_Way_20100321 (1)इस्लाम जीवन बिताने की एक प्रणाली हैजीवन के हर भाग में मार्गदर्शन करता है। इस में किसी प्रकार की कमी औऱ ज़्यादती की कोई गुंजाइश नहीं। कुरआन कहता हैः “आज मैंने तुम्हारा धर्म पूरा कर दिया तुम पर अपनी नेमत पूर्ण कर दी, और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के रूप में पसंद कर किया। (सूरःअल-माइदा 3) यह धर्म इतना ही पुराना है जितना कि स्वयं मनुष्य है। इस्लाम प्रत्येक मनुष्यों का धर्म है जो पहले व्यक्ति आदम अलैहिस्सलाम से शुरू हुआहर युग में संदेष्टा आते रहेलेकिन जब दुनिया सातवीं शताब्दी ईसवी में अपनी जवानी को पहुँच गई तब अल्लाह ने अन्तिम नबी मुहम्मद सल्ल. को विश्व नायक बनाकर भेजा और आपके लाए हुए जीवन व्यवस्था को महाप्रलय के दिन तक के लिए पूर्ण रूप में सुरक्षित कर दिया।

 
जब अपनी पूरी जवानी पे आ गई दुनिया
जहां के वास्ते एक आख़िरी प्याम आया
 
इस्लाम की सार्वभौमिकता जीवन के विभिन्न भागों में है। यह जीवन के आध्यात्मिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, नैतिक तात्पर्य यह कि प्रत्येक भागों में हमारा मार्गदर्शन करता है। समय का समावेश देखें कि इस्लाम हर युग के लिए आया, जगह का समावेश देखें कि इस्लाम का संदेश सारी पृथ्वी को शामिल है। व्यक्तियों का समावेश देखें कि यह सभी व्यक्तियों, सभी जातियों और सभी उम्र के लोगों के लिए है। इस्लामी कानून का समावेश देखें कि यह धर्म और जाति का फर्क़ किए बिना प्रत्येक लोगों के बीच न्याय का मआमला करता है। हर धर्म के मानने वालों को अपने धर्म के पालन की पूरी स्वतंत्रता देता है। अतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध का आदेश देता है , मानव जीवन को संतुलित करने की कोशिश करता है। समय की बहुमूल्यता की ओर ध्यान दिलाता है। ज्ञान में वृधि लाने का आदेश देता है। हलाह माध्यम से माल बढ़ाने पर उभारता और इसके लिए अवैध तरीक़ा अपनाने से रोकता है। इसकी पाबंदी से समाज और देश में शान्ति का वातावरण तो बनता ही है स्वयं व्यक्तिगत जीवन भी शान्ति से परिपूर्ण हो जाता है।

इस्लाम एक विश्वव्यापी धर्म है

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इस्लाम की शिक्षा किसी विशेष स्थान, किसी राष्ट्र, या किसी विशेष समय के लिए नहीं है बल्कि यह पूरी मानवता का धर्म है जो महाप्रलय के दिन तक दुनिया का मार्गदर्शन करता रहेगा। कुरआन स्वयं अपना परिचय कराता हैः “निःसंदेह यह कुरआन मार्गदर्शन है सारी मानवता के लिए।”  (सूरः तक्वीर 27) एक अन्य स्थान पर फरमायाः “महिमावान है वह अल्लाह जिसने अपने बन्दे पर कुरआन उतारा ताकि वह सारी दुनिया के लिए डराने वाला हो।” (सूरः फुरक़ान 1) क़ुरआन अन्तिम नबी मुहम्मद सल्ल. के सम्बन्ध में कहता है “हमने आपको सारे इंसानों के लिए सुसमाचार देने वाला और डराने वाला बनाकर भेजा है। लेकिन अधिकांश लोग इसे नहीं जानते.” (सबा 28)
जी हाँ! यदि वह जानते तो अवश्य आपके संदेश को स्वीकार कर लेते लेकिन वह जानते नहीं हैं जिसके कारण इस संदेश को मुसलमानों का धर्म मान रखा है। 

सत्य धर्म की पहचान क्या है ?

सत्य धर्म वह है….

(1) जिसने सारे मानव के लिए मात्र एक ईश्वर की सही कल्पना दी हो । उसमें ईश्वर का विभाजन न किया गया हो।

(2) जो मानवता को जाति वर्गों में न बांटता हो।

(2) जिसका ग्रन्थ पूर्ण रूप में सुरक्षित हो ।

(3) जिस संदेष्टा पर वह ग्रन्थ अवतरित हुआ उसकी जीवनी उजव्वल और शुद्ध हो ।

(4) उसकी शिक्षाए बुद्धि संगल हों।

(5) उन शिक्षाओं का सम्बन्ध जीवन के प्रत्येक भाग से हो।

(6) उन शिक्षाओं के आधार पर एक शान्तिपूर्ण समाज की स्थापना हर युग और हर स्थान पर हो सकती हो।

यह विशेषताएं यदि किसी धर्म में पाई जाती हैं तो वह है इस्लाम और मात्र इस्लाम। इस लिए  इस्लाम ही विश्व धर्म हो सकता है।

ईश्वर और मानव दोनों के अधिकार का नाम इस्लाम है

विशम्भर नाथ पाण्डे भूतपूर्व राज्यपाल, उड़ीसा
क़ुरआन ‘‘तौहीद’’ यानी एकेश्वरवाद को दुनिया की सबसे बड़ी सच्चाई बताता है। वह आदमी की ज़िन्दगी के हर पहलू की बुनियाद इसी सच्चाई पर क़ायम करता है। क़ुरआन का कहना है कि जब कुल सृष्टि का ईश्वर एक है तो लाज़मी तौर पर कुल मानव समाज भी उसी ईश्वर की एकता का एक रूप है। आदमी अपनी बुद्धि और अपनी आध्यात्मिक शक्तियों से इस सच्चाई को अच्छी तरह समझ सकता इै। इसलिए आदमी का सबसे पहला कर्तव्य यह है कि ईश्वर की एकता को अपने धर्म-ईमान की बुनियाद बनाए और अपने उस मालिक के सामने, जिसने उसे पैदा किया और दुनिया की नेमतें दीं, सर झुकाए। आदमी की रूहानी ज़िन्दगी का यही सबसे पहला उसूल है।
एकेश्वरवाद के सिद्धांत पर ही आधारित क़ुरआन ने दो तरह के कर्तव्य हर आदमी के सामने रखे हैं—एक, जिन्हें वह ‘अल्लाह के अधिकार’ अर्थात् ईश्वर के प्रति मनुष्य के कर्तव्य कहता है और दूसरे, जिन्हें वह ‘मानव के अधिकार’ अर्थात मानव के प्रति-मानव के कर्तव्य। अल्लाह के अधिकार  में नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात, आख़रत और देवदूतों (फ़रिश्तों) पर विश्वास जैसी बातें शामिल हैं, जिन्हें हर व्यक्ति देश काल के अनुसार अपने ढंग से पूरा कर सकता है।
क़ुरआन ने इन्हें इन्सान के लिए फ़र्ज़ बताया है इसे ही वास्तविक इबादत (ईश्वर पूजा) कहा है। इन कर्तव्यों के पूरा करने से आदमी में रूहानी शक्ति आती है।
अल्लाह के अधिकार के साथ ही क़ुरआन ने मानव के अधिकार अर्थात मानव के प्रति मानव के कर्तव्य पर भी ज़ोर दिया है और साफ़ कहा है कि अगर अल्लाह के अधिकार  के पूरा करने में किसी तरह की कमी रह जाए तो ख़ुदा माफ़ कर सकता है, लेकिन अगर  मानव के अधिकार के पूरा करने में ज़र्रा बराबर की कमी रह जाए तो ख़ुदा उसे हरगिज़ माफ़ न करेगा। ऐसे आदमी को इस दुनिया और दूसरी दुनिया, दोनों में, ख़िसारा अर्थात् घाटा उठाना होगा।
 (‘पैग़म्बर मुहम्मद, कु़रआन और हदीस, इस्लामी दर्शन’ गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, नई दिल्ली, 1994)

हमें किस धर्म का पालन करना चाहिए ?

धर्म के सम्बन्ध में कोई जबर्दस्ती नहीं। हाँ! इस विषय पर र्वाता अवश्य होनी चाहिए। वास्तविकता यह है कि
 यह प्रश्न ही बेकार है कि हमें किस धर्म को मानना चाहिए, क्यों कि धर्म तो ईश्वर की ओर से एक ही आयाहै, अनेक नहीं। वह  कैसे ? इस लिए कि :
(1) हमारा ईश्वर एक है अनेक नहीं।
(2) हम सब की रचना एक ही प्रकार से होती आ रही है अन्य प्रकार से नहीं।
(3) हम सब एक ही प्रकार की धातु (वीर्य) से बनते है।
(4) तथा हम सब एक ही (प्रथम) माता पिता की संतान हैं।
तो फिर धर्म अलग अलग कैसे हो सकता है ? लेकिन आज हम अलग अलग धर्म देख रहे हैं इस लिए आज उन धर्मों में से मुक्ति के लिए किसी एक धर्म का चयन करने की आवश्यकता है। लेकिन यहाँ समस्सया यह है कि आज हर धर्म के मानने वाले अपने धर्म को सत्य मान रहे हैं तो इस सम्बन्ध में मापदण्ड क्या हो सकता है… आइए देखते हैं…
(1) पहली बात यह है कि उस धर्म ने एक ईश्वर की कल्पना सिद्ध की हो।
(2) दूसरी बात यह है कि उसका एक संदेष्टा हो जिसकी जीवनी पूर्ण रूप में शुद्ध एवं उजव्वल हो। वह भी
स्वयं को मानव के रूप में पेश करता हों, ईश्वर के रूप में नहीं।
(3) तीसरी बात यह है कि उस धर्म का ग्रन्थ हर प्रकार के विभेद से पाक हो जिसको चुनौति न दी जा सकती हो।
(4) चौथी बात यह है कि उस धर्म ने एक पूर्ण जीवन व्यवस्था पेश किया हो। अर्थात उसका सम्बन्ध जीवन के प्रत्येक भाग में हो।
(5) पाँचवीं बात यह कि उस शिक्षा के आधार पर हर युग में एक शान्तिपूर्ण समाज की स्थापना हो सकती हो ।
(6) छट्ठी बात यह कि उस धर्म ने मानव को विभिन्न जातियों में विभाजित न किया हो। और सब को बराबर का अधिकार प्रदान करता हो ।
 यह 6 गुण जिस धर्म में पाए जाएं वही धर्म “मानव धर्म” हो सकता है।