जब अल्लाह ने सारे इनसानों को पैदा किया है तो उसमें से कुछ लोग बुरे कैसे हो गए ?

wheelchair-300x299एक सज्जन ने पूछा है कि जब अल्लाह ने सारे इनसानों को पैदा किया है तो उन में से कुछ लोग बुरे कैसे हो गए ?

इसका उत्तर यह है कि अल्लाह ने मानव को इस धरती पर परीक्षा हेतु पैदा किया और हर युग और हर देश में संदेष्टाओं द्वारा उनका मार्गदर्शन करता रहा कि तुम यदि एक अल्लाह के नियमानुसार जीवन बिताओगे तो सफलता पाओगे, परन्तु यदि उसके विरोध चलोगे तो नरक में जाओगे। लेकिन जब मानव ने अपने बीच संदेष्टाओं के हाथों पर चमत्कार उत्पन्न होते हुए  देखा तो किसी समूह ने उन्हें ईश्वर का बेटा मान लिया तो किसी ने उनको ईश्वर का रूप दे कर उन्हीं की पूजा शूरु कर दी।
अब क्या था … राक्षस को अवसर मिला मानव को पथभ्रष्ठ करने का … इस प्रकार वह  मानव को बुरे कर्मों में वयस्त करना शुरू कर दिया। मानव भी उनकी मानने लगा क्यों कि अल्लाह ने मानव को सही और ग़लत बताने के बाद अच्छा कर्म करने पर विवश नहीं किया था कि ऐसी परिस्थिति में परीक्षा अर्थहीन सिद्ध होता, इसी लिए उन्हें एखतियार दिया कि चाहे तो नरक में जाए, चाहे तो स्वर्ग में जाए, प्रश्नपत्र आउट है। इसी संदेश को बताने के लिए 124000 संदेष्टा भेजे गए, सब से अन्त में अल्लाह ने अपने अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल. को भेजा और उन पर क़ुरआन अवतरित किया, इनको सारे संसार के लिए भेजा और उनकी शिक्षाओं को प्रमाणित सिद्ध किया, इसी लिए आज ईश्वर तक पहुंचना है तो मात्र क़ुरआन ही हमें पहुंचा सकता है। क्यों कि यही एक सुरक्षित ग्रन्थ है जो हमारे सामने हमारे ईश्वर का सही संदेश परस्तुत करता है।
हमें आशा है कि इस तथ्य को जानने के पश्चात एकांत में इस्लाम के सम्बन्ध में चिंतन मनन करना शुरू करेंगे। हमारा काम संदेश पहुंचाना है मनवाना हमारा काम नहीं। धन्यवाद

बहन फिर्दौस के सवाल और उनके जवाब

बहन फिर्दौस खान ने अपने ब्लौग पर कुछ सवाल पूछा है जो अति महत्वपूर्ण हैं निम्न में उनके जवाब एक एक कर के दे रहा हूँ, कामों के हुजूम, समय की तंगी और सवाल के तफ्सील तलब होने के कारण मैं कई भागों में इसका उत्तर दूगाँ। आशा है कि इन सवालों पर चिंतन मनन करेंगी। हमारा उद्धेश्य ज्ञान का आदान प्रदान है और बस।

सवाल करने से ईमान खतरे में नहीं पड़ताः

सवाल करने से ईमान खतरे में नहीं पड़ता अपितु सवाल करने से ज्ञान में वृद्धि होती है। इसी लिए इस्लाम सवाल कर के ज्ञान को बढ़ावा देने की उत्साह पैदा करता है। मुहम्मद सल्ल0 के साथी आप से कहीं रास्ते में मिलते अथवा सभा में होते सवाल करके धार्मिक ज्ञान प्राप्त करते थे। हदीस की पुस्तकों में इस प्रकार के सवालों का भण्डार पाया जाता है।
स्वयं क़ुरआन में अनुमानतः 15 स्थानों पर यूं आया हैः लोग आप से ….के सम्बन्ध में पूछते हैं, तो आप कह दीजिए कि
सात सवाल सूरः बक़रा में
يسئلونك عن الأهلة –يسئلونك ماذا ينفقون قل ما أنفقتم –يسئلونك عن الشهر الحرام قتال فيه قل قتال فيه– يسئلونك عن الخمر والميسر– ويسئلونك ماذا ينفقون قل العفو–ويسئلونك عن اليتامى قل إصلاح لهم خير– ويسئلونك عن المحيض-
एक सवाल सूरः माईदा में: يسئلونك ماذا أحل لهم قل أحل لكم الطيبات
दो सवाल सूरः आराफ में
. يسئلونك عن الساعة أيان مرساها قل إنما علمها عند ربي— يسئلونك كأنك حفي عنها قل إنما علمها عند الله
एक सवाल सूरः अनफ़ाल में    يسئلونك عن الأنفال قل الأنفال لله والرسول
एक सवाल सूरः इस्रा में ويسئلونك عن الروح قل الروح من أمر ربي
एक सवाल सूरः कहफ़ में  ويسئلونك عن ذي القرنين
एक सवाल सूरः ताहा में ويسئلونك عن الجبال فقل ينسفها ربي نسفاً
एक सवाल सूरः नाज़ियात में  يسئلونك عن الساعة أيان مرساها

क़ुरआन में यह भी आया हैः हमारे उन संदेष्टाओं से पूछो जिन्हें हमने आप से पूर्व भेजा था… “ (सूरःज़ुखरुफ 45)
सवाल आधा ज्ञान है और उत्तर आधा ज्ञान और अच्छा सवाल करना अच्छी बुद्धि का प्रेरक होता है। हदीस की किताब सुनन अबी दाऊद में है कि एक व्यक्ति को सर में ज़ख़्म हो गया, उसने (साधारण लोगों से) पूछा कि क्या मेरे लिए तयम्मुम करने की अनुमति है? लोगों ने (ज्ञान न होने के बावजूद) कह दिया कि नहीं तेरे लिए छूट नहीं। उसने पानी से स्नान कर लिया, जिस से उसके सर में पानी प्रवेश कर गया और वह मर गया। जब अल्लाह के रसूल सल्ल0 को इस की सूचना मिली तो आपने फरमायाः उन लोगों ने उसे (ग़लत मस्ला बता कर) क़त्ल किया है अल्लाह उनको क़त्ल करे, ज्ञान नहीं था तो पूछ ली होती, अज्ञानता की औषधि सवाल करना ही है।”
क़ुरआन यह भी कहता हैः
यदि तुम नहीं जानते हो तो ज्ञान रखने वालों से पूछ लो” (सूरः नहल43)
हाँ सवाल करने से उस समय मना किया गया है जबकि ऐसी चीज़ के सम्बन्ध में सवाल किया जाए जिसकी कोई ज़रूरत न हो। उसी प्रकार सवाल करने का तात्पर्य समझना हो न कि बकवास करना।

इस्लाम सुधारवादी बनाता है आतंकवादी नही

इस्लाम ने मानव को हर योग में सुधार की शिक्षा दी और आतंक से दूर रखा बल्कि इस्लाम आया ही इसी लिए ताकि शान्तिपूर्ण समाज की स्थापना हो, कुप्रथाओं का नष्ट हो और समाज में प्रेम की भावनाएं पैदा हों। इसी लिए मुसलमान जहाँ कहीं गए लोगों ने उनके प्रेम-भाव से प्रभावित हो कर उनके धर्म को गले लगा लिया। स्वयं भारत में जब मुहम्मद बिन क़ासिम का आगमन हुआ तो उनके आचरण तथा सद्-व्यवहार से भारतवासी इतने प्रभावित हुए कि भारत के हिन्दुओं ने अपने मन्दिरों में उनका चित्र बना कर सजा लिया। इस्लाम इस बात की अनुमति कदापि नहीं देता कि लोग सुधार के नाम पर मरने मारने के लिए उतारू हो जाएं और यदि कोई मरने मारने पर उतारु हो चुका है तो वह आतंकवादी है सुधारवादी नहीं। इस्लाम का आतंक से कोई सम्बन्ध नहीं, इस्लाम और आतंक ऐसे ही है जैसे आग और पानी। इस्लाम का शाब्दिक अर्थ ही होता है “शान्ति”। Continue reading बहन फिर्दौस के सवाल और उनके जवाब

ऐसा क्यों ?

यह एक प्रार्थना है, अनुरोध है, गुज़ारिश है साम्प्रदाइकता के सदस्यों से! क्योंकि मैं भी एक भारतीय हूँ। भारत की धरती से प्यार करता हूं, इस पावन धरती की स्वतंत्रता में अपने पूवर्जों के बलिदान हमें याद हैं। फिर इतिहास ने यह भी देखा है कि हमने अपने देश में शताब्दियों से अनेकता में एकता का प्रदर्शन किया है। हर धर्म एवं पथ के मानने वाले शान्ति के साथ इस धरती पर रहते रहे हैं।
इस नाते मैं अपनी भावना जो दिल की गहराई से निकली हुई है साम्प्रदाइकता के सदस्यों के नाम पेश करना चाहता हूं। शायद कि उतर जाए तेरे दिल में मेरी बात
आपने मुम्बई में रहने वाले यूपी बिहार के लोगों को मुम्बई से निकालने की योजना बनाई, पूना के लोहगाँव के मुसलमानों को आपने जन्मभूमि से निकलने पर विवश किया। औऱ अब एक नया शोशा यह छौड़ा है कि (मुसलमान हिन्दुओं को काफिर कहना छोड़ दें और भारत को दारुल हर्ब भी कहें)
प्रिय बन्धुओ! मैं यही समझता हूं कि आपको मनवता से प्यार है। इस नाते आपने शत्रुता में यह बात कही होगी, शायद यह आपत्ती अज्ञानता के कारण है। अतः यदि आपने ऐसा बयान अज्ञानता के कारण दिया है तो इसका निवारण किए देता हूं।

हिन्दुस्तान दारुल हर्ब नहीं
जहां तक भारत को दारुल हर्ब कहने की बात है तो कोई मुसलमान अथवा इस्लामी विद्बान हिन्दुस्तान को दारुल हर्ब नहीं कहते। सब से पहले दारुल हर्ब क्या है इसे समझ लें। दारुल हर्ब वह धरती है जहां मुलमानों के लिए धार्मिक किसी प्रकार का काम करना वर्जित हो। वहां हर समय मुसलमान अपने जान तथा सम्पत्ति के सम्बन्ध में चिंतित हों। और ऐसा मुसलमानों के लिए भारत में नहीं है।
दूसरी बात यह कि दारुल हर्ब को अर्थ युद्ध करने का स्थान नहीं। बल्कि जैसा कि मैंने कहा कि वह देश जहां गैरमुस्लिम मुसलमानों पर अत्याचार कर रहे हों, और मुसलमानों को वहाँ कोई शक्ति प्राप्त हो।
इस अर्थ को सामने रखें और स्वंय सोच कर देखें कि मुलममानों के लिए भारत आखिर दारुलहर्ब कैसे होगा? यही कारण है कि जब मेडिया में यह चर्चा आम हुई लो मुस्लिम समितियों की ओर से फत्वा भी आया कि हिन्दुस्तान दारुलहर्ब नहीं।
जैसे दारुलउलूम दिउबंद तथा विभिन्न मुस्लिम विद्वानों ने बयान दिया कि हिन्दुस्तान दारुल हर्ब नहीं और कभी हो सकता है।
ग़ैर मुस्लिमों को काफिर कहना

जहां तक ग़ैर मुस्लिमों को काफिर कहने की बात है तो यह याद रखें कि कोई भी मुलमनान किसी गैरमुस्लिम को काफिर नहीं कहता। बल्कि काफिर कह कर पुकारने से मुहम्मद सल्ल0 ने मना किया है। दूसरी बात यह कि काफिर का अर्थ क्या होता है? उस पर भी ग़ौर करके देख लीजिए काफिर अरबी शब्द है जिसका हिन्दी अनुवाद करें को होगा(अमुस्लिल, अथावा गैरमुस्लिम) अग्रेज़ी अनुवाद करें तो होगा(Non Muslim) अब आप ही बताएं कि एक व्यक्ति या तो मुस्लिम होगा अथवा गैरमुस्लिम, तीसरी कोई संज्ञा नहीं। यदी कोई गैरमुस्लिम होना पसंद करता हो तो वह मुस्लिम बन जाए। समस्या का समाधान बस इसी में है। इस सम्बन्ध में लीजिए डा0 ज़ाकिर नाइक का उत्तर भी पढ़ लीजिए
(काफिर अरबी भाषा का शब्द है जो कुफ्र से निकला है इस शब्द का अर्थ है छुपाना, इनकार करना और रद्द करना अर्थात ऐसा व्यक्ति जो इस्लामी आस्था का इनकार करे अथवा उसे रद्द कर दे उसे इस्लाम में काफिर कहा जाता है। दूसरे शब्दों में जो व्यक्ति इस्लाम के ईश्वरीय कल्पना का इनकार कर दे वह काफिर कहलाएगा। यदि हमें इस शब्द का अंग्रेज़ी में अनुवाद करना होगा तो कहूंगा Non Muslim अर्थात जो व्यक्ति इस्लाम को स्वीकार नहीं करता वह Non Muslim है और अरबी में कहा जाएगा कि वह काफिर हैअतः यदि आप यह मुतालबा करते हैं कि Non Muslim को काफिर कहा जाए तो यह किस प्रकार सम्भव होगा ? यदि कोई गैर मुस्लिम यह मुतालबा करे कि मुझे काफिर कहा जाए अर्थात ग़ैर मुस्लिम कहा जाए तो मैं यही कह सकता हूँ कि श्रीमान! आप इस्लाम स्वीकार कर लें तो स्वयं आपको ग़ैरमुस्लिम अर्थात काफिर कहना छोड़ दूंगा क्योंकि काफिर और ग़ैरमुस्लिम में कोई अतंर तो है नहीं, यह तो सीधा सीधा शब्द का अरबी अनुवाद Non Muslim है और बस।)

काफिर कह कर गाली क्यों ?

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मुसलमान ग़ैर मुस्लिमों को काफिर कह कर गाली क्यों देते हैं ?

उत्तर : काफिर अरबी भाषा का शब्द है जो कुफ्र से निकला है इस शब्द का अर्थ है छुपाना, इनकार करना और रद्द करना अर्थात ऐसा व्यक्ति जो इस्लामी आस्था का इनकार करे अथवा उसे रद्द कर दे उसे इस्लाम में काफिर कहा जाता है। दूसरे शब्दों में जो व्यक्ति इस्लाम के ईश्वरीय कल्पना का इनकार कर दे वह काफिर कहलाएगा। यदि हमें इस शब्द का अंग्रेज़ी में अनुवाद करना होगा तो कहूंगा Non Muslim अर्थात जो व्यक्ति इस्लाम को स्वीकार नहीं करता वह Non Muslim है और अरबी में कहा जाएगा कि वह काफिर है-

अतः यदि आप यह मुतालबा करते हैं कि Non Muslim को काफिर न कहा जाए तो यह किस प्रकार सम्भव होगा ? यदि कोई गैर मुस्लिम यह मुतालबा करे कि मुझे काफिर न कहा जाए अर्थात ग़ैर मुस्लिम न कहा जाए तो मैं यही कह सकता हूँ कि श्रीमान! आप इस्लाम स्वीकार कर लें तो स्वयं आपको ग़ैर-मुस्लिम अर्थात काफिर कहना छोड़ दूंगा क्योंकि काफिर और ग़ैर-मुस्लिम में कोई अतंर तो है नहीं, यह तो सीधा सीधा शब्द का अरबी अनुवाद Non Muslim है और बस।

( डा0 ज़ाकीर नाइक )